विक्रम संवत: कब और किसके द्वारा प्रारंभ किया गया? Vikram Samvat: When and by whom was it started?


विक्रम संवत: कब और किसके द्वारा प्रारंभ किया गया? Vikram Samvat: When and by whom was it started?

शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।


1. प्रस्तावना

भारतीय पंचांग और कालगणना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। विभिन्न कालखंडों में अनेक राजाओं और शासकों ने अपने विजय अभियान या विशेष ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर युग या संवत की शुरुआत की। विक्रम संवत भी ऐसा ही एक प्रसिद्ध और प्राचीन भारतीय संवत है, जो आज भी उत्तर भारत, नेपाल और कई अन्य क्षेत्रों में धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यों के लिए प्रयोग किया जाता है।

विक्रम संवत की शुरुआत राजा विक्रमादित्य द्वारा 57 ईसा पूर्व (ई.पू.) में मानी जाती है। यह संवत उनकी शौर्यगाथा, पराक्रम और पराजित शकों के ऊपर विजय की स्मृति में प्रारंभ हुआ।


2. विक्रम संवत का परिचय

  • विक्रम संवत एक हिंदू कालगणना प्रणाली है, जो सौर और चंद्र दोनों गणनाओं पर आधारित है।
  • यह संवत भारतीय इतिहास और संस्कृति में समय की गणना का एक महत्वपूर्ण साधन रहा है।
  • आज भी यह धार्मिक त्योहारों, व्रतों, ज्योतिषीय गणनाओं, विवाह आदि शुभ कार्यों में प्रयोग होता है।

3. विक्रमादित्य कौन थे?

विक्रम संवत के संस्थापक राजा विक्रमादित्य थे।

  • परंपरागत मान्यता है कि विक्रमादित्य उज्जयिनी (मध्य प्रदेश) के शासक थे।
  • उनका नाम भारत के आदर्श और वीर राजा के रूप में अमर हो गया।
  • वे केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ, दानवीर और न्यायप्रिय शासक भी थे।
  • विक्रमादित्य के बारे में अनेक लोककथाएँ, कथाएँ और दंतकथाएँ प्रसिद्ध हैं, जैसे सिंहासन बत्तीसी, वेताल पंचविंशति और विक्रम-बेताल की कहानियाँ

4. विक्रम संवत की शुरुआत का ऐतिहासिक प्रसंग

(क) शक आक्रमण और उज्जयिनी की विजय

ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, विक्रमादित्य ने शक (शक-क्षत्रप) नामक आक्रामक विदेशी जातियों को हराया था।

  • शक लोग मध्य एशिया से भारत आए थे और उन्होंने कई भारतीय क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी।
  • विक्रमादित्य ने शक शासकों को पराजित कर उज्जयिनी को आज़ाद कराया।
  • इस विजय की स्मृति में उन्होंने 57 ईसा पूर्व में विक्रम संवत की शुरुआत की।

(ख) परंपरागत मान्यता

  • कहा जाता है कि इस युद्ध में विक्रमादित्य ने समस्त भारतीय राजाओं को एकजुट कर शक आक्रमणकारियों को हराया।
  • इस विजय को इतिहास में एक मील का पत्थर माना गया और इसी की याद में नया संवत आरंभ हुआ।

5. विक्रम संवत का समय निर्धारण

(क) प्रारंभिक वर्ष

  • विक्रम संवत 57 ईसा पूर्व से प्रारंभ माना जाता है।
  • इसका अर्थ है कि ईसवी सन (Gregorian calendar) में किसी भी वर्ष को विक्रम संवत में बदलने के लिए 57 वर्ष जोड़ दिए जाते हैं
    • उदाहरण:
      • ईसवी सन 2025 = विक्रम संवत 2025 + 57 = 2082 विक्रम संवत

(ख) चंद्र और सौर पंचांग

विक्रम संवत की गणना चंद्र मास (चांद की गति पर आधारित महीनों) और सौर वर्ष (सूर्य की गति पर आधारित) दोनों से की जाती है।

  • उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (मार्च-अप्रैल) को विक्रम संवत का नव वर्ष माना जाता है।
  • गुजरात और राजस्थान में यह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन) से प्रारंभ होता है।

6. विक्रम संवत की विशेषताएँ

  1. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:
    • अधिकतर हिंदू पर्व जैसे होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, दीपावली आदि विक्रम संवत के अनुसार ही मनाए जाते हैं।
  2. ज्योतिषीय गणना:
    • विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ और अन्य शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त और पंचांग विक्रम संवत के अनुसार बनाए जाते हैं।
  3. क्षेत्रीय मान्यता:
    • नेपाल में आज भी विक्रम संवत राष्ट्रीय कैलेंडर है।
    • भारत के कई राज्यों (राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश) में धार्मिक कार्य इसी संवत के आधार पर होते हैं।

7. विक्रमादित्य की उपलब्धियाँ

(क) प्रशासनिक दक्षता

  • विक्रमादित्य का शासन न्यायप्रिय, दानशील और जनकल्याणकारी माना जाता है।
  • उन्होंने उज्जयिनी को विद्या, कला और व्यापार का केंद्र बनाया।

(ख) विद्वानों का संरक्षण

  • उनके दरबार में नौ रत्नों का वर्णन मिलता है।
  • इनमें कालिदास (महाकवि), वराहमिहिर (ज्योतिषी), धन्वंतरि (वैद्यक शास्त्रज्ञ) आदि प्रमुख थे।

(ग) सांस्कृतिक उन्नति

  • विक्रमादित्य के काल में साहित्य, संगीत, नाट्यकला, विज्ञान, खगोल विज्ञान का खूब विकास हुआ।

8. विक्रम संवत की गणना और पंचांग

(क) विक्रम संवत और ईसवी संवत का अंतर

  • विक्रम संवत ईसवी संवत (AD) से 57 वर्ष आगे चलता है।
    • उदाहरण: 2025 ई. = 2082 विक्रम संवत।

(ख) महीनों का क्रम

विक्रम संवत के 12 महीने होते हैं –
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन।

(ग) तिथियाँ और ऋतुएँ

  • प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा) और कृष्ण पक्ष (पूर्णिमा से अमावस्या) में बंटा होता है।
  • छह ऋतुएँ – वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर

9. विक्रम संवत का सांस्कृतिक महत्व

  1. त्योहारों का आयोजन:
    • होली (फाल्गुन पूर्णिमा), दीपावली (कार्तिक अमावस्या), रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) आदि सभी पर्व विक्रम संवत की तिथियों पर मनाए जाते हैं।
  2. क्षेत्रीय परंपराएँ:
    • गुजरात में विक्रम संवत का नया साल दीपावली के बाद आरंभ होता है।
    • उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश) में यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है।
  3. धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख:
    • कई हिंदू और जैन ग्रंथों में घटनाओं का उल्लेख विक्रम संवत की तिथियों से मिलता है।

10. विक्रम संवत और अन्य संवतों की तुलना

भारत में कई अन्य संवत भी प्रचलित हैं:

  • शक संवत: 78 ईस्वी में शक शासकों द्वारा शुरू।
  • हिजरी संवत: 622 ईस्वी में इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत।
  • कल्लुगणन संवत: दक्षिण भारत के इतिहास में प्रचलित।

विक्रम संवत की विशेषता यह है कि यह अन्य संवतों की तुलना में प्राचीन और व्यापक है।


11. विक्रम संवत से जुड़ी कथाएँ और लोककथाएँ

(क) सिंहासन बत्तीसी

  • लोककथाओं के अनुसार, विक्रमादित्य के सिंहासन में 32 पुतलियाँ थीं जो उनकी वीरता और न्यायप्रियता की गाथाएँ सुनाती थीं।

(ख) विक्रम-बेताल की कहानियाँ

  • ये कहानियाँ विक्रमादित्य की बुद्धिमत्ता और साहस को दर्शाती हैं।

इन कथाओं का सीधा संबंध भले ही ऐतिहासिक सत्य से न हो, लेकिन उन्होंने विक्रमादित्य की छवि को अमर बना दिया।


12. विक्रम संवत का आधुनिक महत्व

आज भी विक्रम संवत का प्रयोग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में प्रमुखता से होता है।

  • हिंदू विवाह, गृहप्रवेश, मुहूर्त निर्धारण जैसे कार्य इसी संवत के अनुसार किए जाते हैं।
  • भारत सरकार के कैलेंडरों में भी विक्रम संवत की तिथियाँ दर्ज होती हैं।
  • नेपाल में यह आधिकारिक कैलेंडर है।

13. निष्कर्ष

विक्रम संवत भारत की प्राचीन कालगणना और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। इसका आरंभ राजा विक्रमादित्य की पराक्रम गाथा और शकों पर विजय की स्मृति में हुआ।

विक्रम संवत न केवल कालगणना की प्रणाली है, बल्कि यह भारतीय समाज की धार्मिक मान्यताओं, त्योहारों और सांस्कृतिक जीवन का आधार भी है। इसकी गणना और उपयोग यह दर्शाते हैं कि भारत में समय की गणना सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संस्कृति और इतिहास का जीवंत हिस्सा है।

राजा विक्रमादित्य का नाम और उनका संवत आज भी भारतीय जनता के हृदय में वीरता, न्याय और संस्कृति की पहचान के रूप में जीवित है।


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