भारतीय इतिहास शौर्य महिमा और महानता की गाथा Indian history is a tale of valor glory and greatness
शुरुआत से अंत तक जरूर पढ़ें।
भारत का इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह सभ्यता, संस्कृति, शौर्य, ज्ञान और मानवता की अद्वितीय यात्रा है। यहाँ की धरती पर जन्म लेने वाले राजाओं की वीरता, विद्वानों की विद्या, संतों की अध्यात्मिकता और जनता की संघर्षशीलता ने इसे “विश्वगुरु” का दर्जा दिलाया।
🏞️ प्रारंभिक काल – सभ्यता का उदय
भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता (3300 ई.पू.–1500 ई.पू.) से शुरू होता है।
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हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे नगर उस समय विश्व की सबसे विकसित नगरीय सभ्यताओं में गिने जाते थे।
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यहाँ नियोजित नगर, जलनिकासी प्रणाली, विशाल गोदाम और व्यापारिक मार्ग विकसित थे।
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सिंधु घाटी के लोग व्यापार, हस्तशिल्प, कृषि और धातु-कला में निपुण थे।
👉 यह भारत की संगठित और कौशलपूर्ण जीवन-शैली का पहला उदाहरण है।
🌅 उदय और काल-विभाजन
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समय-सीमा (आम सहमति):
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प्रारम्भिक/पूर्व-हड़प्पा: लगभग 3300–2600 ई.पू.
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परिपक्व/मच्योर हड़प्पा: लगभग 2600–1900 ई.पू. (स्वर्ण काल)
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उत्तर/लेट हड़प्पा: लगभग 1900–1300 ई.पू.
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भौगोलिक विस्तार: उत्तर-पश्चिम से पश्चिमी भारत तक—सुतकगेन-दोर (मकरान तट) से लेकर आलमगीरपुर (प. उ. प्र.) तक, शोर्टुगाई (अफगानिस्तान) तक के व्यापारिक चौकियाँ; सिंध, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, बलूचिस्तान तक फैला एक विशाल सांस्कृतिक क्षेत्र।
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मुख्य नगर: मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धोलावीरा, राखीगढ़ी, कालीबंगन, लोथल, चन्हूदड़ो आदि। इनका नेटवर्क सैकड़ों (हज़ार+ खोजे गए) स्थलों पर आधारित था।
🏙️ नगरीय नियोजन और स्थापत्य (Urban Planning)
सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान उसका वैज्ञानिक और मानकीकृत शहरी नियोजन है:
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ग्रिड-पैटर्न शहर:
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सड़कों का उत्तर–दक्षिण और पूर्व–पश्चिम में समकोण पर मिलना।
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चौड़ी मुख्य सड़कें, उनसे कटती संकरी गलीयाँ—ट्रैफिक, हवा और पानी की निकासी को ध्यान में रखकर बनाया गया विन्यास।
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ऊपरी दुर्ग (Citadel) और निचला नगर (Lower Town):
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ऊँचे चबूतरे/दुर्ग पर प्रशासन/धार्मिक/सार्वजनिक संरचनाएँ—नीचे आवासीय बस्तियाँ।
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यह विभाजन नियंत्रण, सुरक्षा और सार्वजनिक उपयोगिताओं के केंद्रीकरण का संकेत देता है।
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ईंटों का मानकीकरण:
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पकी हुई ईंटें (standard ratios) और कच्ची ईंटें—भवन, दीवारें, नालियाँ, कुएँ तक में समान माप।
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ईंट मानक दिखाते हैं कि राज्य/प्रशासनिक स्तर पर मानक तय थे।
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जल प्रबंधन व स्वच्छता:
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निर्मित नालियाँ जिन पर ढक्कन/कवर, घरों से निकलती शाखा-नालियाँ मुख्य नालियों में जुड़तीं—अद्भुत सीवरेज सिस्टम।
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निजी स्नान-स्थल, आँगन, कुएँ, वर्षा-जल संचयन के साक्ष्य।
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मोहनजोदड़ो का ‘महास्नान’ (Great Bath)—सार्वजनिक स्नानागार; धोलावीरा में जल-संग्रह और बाँध/टैंक—शुष्क जलवायु में उन्नत हाइड्रोलॉजी का साक्ष्य।
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सार्वजनिक भंडार/ग्रैनरी (व्याख्यात्मक):
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हड़प्पा/मोहनजोदड़ो में बड़े कक्ष/प्लेटफ़ॉर्म जिन्हें कई विद्वान अनाज-भंडार मानते हैं—अनाज/रसद के संगठित प्रबंधन का संकेत।
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🌾 कृषि, पशुपालन और आहार
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फसलें: गेहूँ, जौ प्रमुख; गुजरात क्षेत्र में बाजरा और अन्य सूखा-सहिष्णु अनाज; उत्तरवर्ती चरणों में चावल के संकेत सीमित रूप में।
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कपास (Cotton): कपास के शुरुआती उपयोग का प्रमाण—कपड़ा-बुनाई की उन्नत परंपरा।
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कृषि तकनीक: हल के निशान (कालीबंगन), खेत के खांचे; सिंचाई के लिए नहर/तालाब/कुएँ; बैलगाड़ी और पशु-शक्ति पर आधारित कृषि।
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पशुपालन: गाय-बैल, भैंस, भेड़-बकरी, सूअर; ऊँट व हाथी के प्रयोग/प्रतिमाएँ; घोड़े का प्रमाण सीमित/विवादित—सावधानी से समझा जाता है।
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आहार: अनाज, दालें, तिलहन, फल-सब्ज़ियाँ; मछली/पशु-उत्पाद; मसाले/सुगंधित पदार्थों के संकेत व्यापार से भी मिलते हैं।
🛍️ व्यापार और अर्थव्यवस्था
सिंधु नगरीय संस्कृति एक व्यापार-केन्द्रित/कौशल-आधारित अर्थव्यवस्था थी:
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आन्तरिक व्यापार-जाल:
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नदी-घाटियों (सिंधु, घग्गर-हकरा, नर्मदा उपत्यका) और स्थल–समुद्री मार्गों से नगरों/गाँवों का आदान-प्रदान।
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मानकीकृत तोल-माप—वज़न के क्यूब्स (1:2:4:8… की श्रेणी), हाथीदाँत/पाषाण की माप-छड़—वाणिज्य का विश्वसनीय ढाँचा।
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बाहरी (विदेश) व्यापार:
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मेसोपोटामिया के अभिलेखों में “मेलुह्हा” का उल्लेख—अक्सर हड़प्पा से जोड़ा जाता है।
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लोथल का ज्वारीय डॉक्स/बंदरगाह—समुद्री व्यापार का ठोस साक्ष्य (खाड़ी देशों/ओमान, मेसोपोटामिया तक)।
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निर्यात: कार्नेलियन/लाजवर्द मणके, काँच-जैसे फैयांस, कपास-वस्त्र, शंख-शिल्प, लकड़ी, धातु/ताम्र–कांस्या वस्तुएँ।
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आयात: बहुमूल्य पत्थर (लाजवर्द–अफ़गानिस्तान), टिन (कांस्या मिश्रधातु हेतु), तांबा/कच्ची धातु आदि।
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शिल्प–उद्योग के केन्द्र:
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चन्हूदड़ो, लोथल, धोलावीरा—मणका-उद्योग; बालू-पत्थर/स्टीटाइट की मुहरें; शंख/हाथीदाँत कारीगरी; धातु-कला—ढलाई, ठप्पा, रिपूस्से, लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग।
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🛠️ कला–कौशल और प्रौद्योगिकी
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धातु-कला: तांबा/कांस्या, कभी-कभार सीसा/चाँदी/सोना; औज़ार—कुल्हाड़ी, छेनी, आरी, भाला-नोक; मानकीकृत उत्पादन के संकेत।
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फैयांस/काँच-सरीखा पदार्थ: चमकदार मनके/गहने—उन्नत ताप-प्रबंधन व रसायन-ज्ञान।
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मणका-उद्योग: कार्नेलियन/अगेट को आग से ताप–शमन कर रंग/पैटर्न देना; सूक्ष्म ड्रिलिंग—अतिसूक्ष्म छेद।
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सिरेमिक/मिट्टी-शिल्प: अच्छी तरह पकाई गई लाल/धूसर मिट्टी; चित्रांकन, खिलौने—रथ, पशु, पक्षी, नर्तकी, घर-घर खेलने वाली गुड़िया।
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स्थापत्य-कला: ईंट-मेहराब अभी सीमित; पर जलनिकासी, प्लास्टर, जल-रोधक लेप, काष्ठ-आधारित छत/बीम—व्यावहारिक नवाचार।
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‘नर्तकी की मूर्ति’ (कांस्या, मोहनजोदड़ो) व पशुपति-सील जैसी खोजें कला/आस्था की प्रतीकात्मक ऊँचाई दिखाती हैं।
📜 लिपि, मुहरें और प्रशासन
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लिपि (Indus Script):
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अभी तक अपठित; छोटे-छोटे लेख मुहरों, पट्टियों, ताम्र/मिट्टी की तख्तियों पर; लेख कुछ अक्षरों/चिन्हों में सीमित (अधिकतर 4–8)।
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दायाँ-से-बायाँ लिखने के संकेत, पर बहस जारी।
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लिपि का अपठित रहना—शासन, भाषा और धर्म की सटीक समझ में बाधा है, फिर भी प्रशासनिक नियंत्रण का संकेत स्पष्ट है।
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मुहरें (Seals):
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स्टीटाइट पर उत्कीर्ण एक-सींग वाला ‘यूनिकॉर्न’, बैल, बाघ, हाथी, गैंडा, बकरी—पशु-प्रतीकों के साथ लघु-लेख।
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मुहरें स्वामित्व, पहचान, व्यापार-लेखांकन/सीलिंग के लिए—कई स्थानों पर मिट्टी-सीलिंग के साथ पाई गईं।
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समानता/मानकीकरण से केंद्रीकृत नियंत्रण/समन्वित नगर-प्रशासन का आभास।
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🧭 समाज, सत्ता-संरचना और दैनिक जीवन
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समाज-रचना:
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बड़े महलों/राज-समाधियों की अनुपस्थिति—सापेक्ष समतावादी/नियंत्रित-पर-स्थानीय शासन-रूप की संभावना (विद्वानों में मत-भेद)।
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फिर भी घरों, दफ़्तरों, शिल्प-केंद्रों के आकार/गुणवत्ता में अंतर—कुछ सामाजिक विभाजन/विशेषज्ञ वर्ग का संकेत।
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दैनिक जीवन:
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ईंट-निर्मित घर, 1–2 मंज़िल, केंद्रीय आँगन, स्नान-स्थल, रसोई; कुछ घरों में निजी कुएँ तक।
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खेल-खिलौने, पासे, बोर्ड-खेल—मनोरंजन/सीखने की संस्कृति।
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परिधान/आभूषण: सूती वस्त्र, मनके-मालाएँ, शंख/कांस्या/सोने के आभूषण; पुरुष–महिला दोनों अलंकृत।
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परिवहन: बैलगाड़ी, स्लेज, नदी/समुद्र-नौकाएँ—व्यापार/यात्रा के सहारे।
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🕯️ धर्म और आस्थाएँ (पुरातात्त्विक व्याख्या)
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माता-देवी/उर्वरता-प्रतीक की टेराकोटा प्रतिमाएँ—उर्वरता/समृद्धि के पूजन का संकेत।
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पशुपति-आकृति (तीन-चेहरा-सी मुद्रा, पशुओं से आबद्ध)—कुछ विद्वानों द्वारा ‘प्रोटो-शिव’ की परिकल्पना, पर निर्णायक प्रमाण नहीं।
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अग्निकुंड/हवन-चिह्न (कालीबंगन) और महास्नान जैसे सार्वजनिक स्नान—शुद्धि/संस्कार पर बल।
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पवित्र वृक्ष/जानवर—पीपल/बरगद, बैल आदि के प्रतीक; ताबीज/तंत्रिक-चिह्न भी मिलते हैं।
नोट: धर्म-सम्बन्धी निष्कर्ष लिपि अपठित होने के कारण अनुमानाधारित हैं—अंतिम सत्य नहीं।
🧩 पतन और रूपान्तरण (c. 1900 ई.पू. के बाद)
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पर्यावरणीय/नदीय परिवर्तन:
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घग्गर–हकरा (संभावित सरस्वती) तंत्र के सूखने/मार्ग-बदलाव, सूखा/जलवायु परिवर्तन, बार-बार की बाढ़—शहरी तंत्र पर दबाव।
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व्यापार-पतन:
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मेसोपोटामिया के साथ समुद्री व्यापार का क्षीण होना, धातु-आपूर्ति/कच्चे माल में कमी।
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विकेन्द्रीकरण:
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बड़े नगरों का त्याग/संकुचन, छोटे ग्रामीण बस्तियों की ओर झुकाव; लेट हड़प्पा संस्कृतियाँ (पंजाब–हरियाणा–गुजरात) में क्षेत्रीय भिन्नता।
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रोग/सामाजिक कारक:
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कुछ स्थलों पर भीड़/अस्वस्थता/संघर्ष के संकेत—पर एकल कारण नहीं, बहु-कारकीय पतन माना जाता है।
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निरंतरता:
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मृदाभांड/आभूषण/कौशल/तौल-मानक/ग्राम्य-योजना के कुछ तत्व आगे की संस्कृतियों में सांस्कृतिक स्मृति की तरह मौजूद रहे।
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🏛️ विशिष्ट स्थल—संक्षिप्त झलक
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मोहनजोदड़ो (सिंध): विशाल नगर-योजना, महास्नान, चौड़ी सड़कें, ढंकी नालियाँ, उच्च दर्जे की ईंटकारी।
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हड़प्पा (पंजाब): संभावित ग्रैनरी ब्लॉक्स, कारखाने, मुहरें, वज़न; प्रशासनिक नियोजन के साक्ष्य।
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धोलावीरा (कच्छ): जल-संचयन/बंध की अद्भुत व्यवस्था, अक्षरों/संकेत वाला बड़ा फलक (साइनबोर्ड-जैसी खोज), किलेबंदी।
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लोथल (गुजरात): ईंट का ज्वारीय डॉक्स/घाट, मणका-उद्योग, शंख-कारीगरी; समुद्री व्यापार का केंद्र।
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कालीबंगन (राजस्थान): हल-माँड के स्पष्ट निशान, अग्निकुंड; नियोजित बस्ती।
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राखीगढ़ी (हरियाणा): उत्तरी क्षेत्र का विशाल शहरी केन्द्र; आवासीय/शिल्पिक साक्ष्य प्रचुर।
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चन्हूदड़ो: मणका/गहना उद्योग, सूक्ष्म शिल्प—निर्यात-उन्मुख हस्तकला।
🧠 ज्ञान-कौशल और “कौशलपूर्ण जीवन-शैली” का सार
आपने लिखा—“संगठित और कौशलपूर्ण जीवन-शैली का पहला उदाहरण”—इसे वस्तुनिष्ठ रूप से ऐसे समझें:
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मानकीकरण की संस्कृति:
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ईंटों, वज़नों, नाप-इकाइयों, मुहरों और शहरी विन्यास में एकरूपता—बड़े भूभाग में गवर्नेंस/समन्वय का संकेत।
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जन-स्वास्थ्य और शहरी सुविधाएँ:
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घर-घर स्नान-स्थल, ढंकी नालियाँ, कूड़ा-प्रबंधन—स्वच्छता-केन्द्रित नगर-जीवन की मिसाल।
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विपुल हस्तकला–उद्योग:
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धातु, मनके, शंख, फैयांस, कपड़ा—उच्च कौशल और उत्पादन-श्रृंखला (workshops)।
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वैश्विक सम्पर्क:
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सुदूर व्यापार-जाल, बंदरगाह, विदेशी मुद्राएँ/वस्तुएँ—समुद्री–स्थलीय लॉजिस्टिक्स का ज्ञान।
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पर्यावरण-हितैषी इंजीनियरिंग:
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जल-संग्रह, निकासी, स्थानीय सामग्री का सटीक उपयोग—जलवायु-अनुकूल शहरीकरण।
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🧭 अनुत्तरित प्रश्न और विद्वत-बहस
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लिपि/भाषा: अभी अपठित—द्रविड़/मुण्डा/इण्डो-आर्य? बहस जारी।
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राज्य-प्रकृति: केंद्रीकृत साम्राज्य बनाम नगर-राज्य/संघ—पुख्ता शिलालेख/शाही मकबरे नहीं, इसलिए मतभेद।
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धर्म/देवता: ‘माता-देवी’, ‘पशुपति’ व्याख्याएँ—आंशिक/अनुमानाधारित; निर्णायक साक्ष्य नहीं।
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पतन का कारण: बहु-कारक मॉडल—जलवायु, नदी-पथ, व्यापार, संसाधन-दबाव; एकल कारण नहीं।
🧬 विरासत और प्रभाव
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कौशल–परक शहरी योजना और जन-स्वास्थ्य की दूरदर्शिता—आधुनिक नगर-योजना के लिए प्रेरक।
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हस्तकला/आभूषण–परंपराओं का प्रवाह—गुजरात–सिंध के मनका/शंख उद्योगों में सांस्कृतिक निरंतरता के संकेत।
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भारतीय सभ्यता की पहचान: बहु-केन्द्रिक, व्यावहारिक, व्यापार-समर्थ और प्रकृति-संगत विकास—यही सिंधु की सबसे बड़ी देन है।
✅ निष्कर्ष—आपके बिंदुओं का विस्तृत अर्थ
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“हड़प्पा–मोहनजोदड़ो विकसित नगर थे” → ग्रिड-प्लान, ढंकी नालियाँ, निजी स्नान, सार्वजनिक स्नानागार, मानकीकृत ईंट—विश्व-स्तरीय शहरी इंजीनियरिंग।
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“नियोजित नगर, जलनिकासी, गोदाम, व्यापार-मार्ग” → सिविल इंजीनियरिंग + लॉजिस्टिक्स + भंडारण के समेकित तंत्र।
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“व्यापार, हस्तशिल्प, कृषि, धातुकला” → बहु-आधार वाली अर्थव्यवस्था; आन्तरिक–बाह्य व्यापार और विशेषीकृत उद्योग।
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“संगठित और कौशलपूर्ण जीवन-शैली” → मानकीकरण, स्वच्छता-प्रणाली, जल-प्रबंधन, शिल्प-उद्योग, दूरगामी व्यापार—सुसंगठित, उन्नत और टिकाऊ शहरी सभ्यता।
🔱 वैदिक काल – ज्ञान और धर्म का युग
1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक वैदिक काल रहा।
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ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद की रचना इसी काल में हुई।
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इस समय समाज चार वर्णों में विभाजित हुआ – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
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यज्ञ, शिक्षा, खगोल, गणित और चिकित्सा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
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ऋषि-मुनियों और विद्वानों ने धर्म, दर्शन और जीवन-नीति पर गहन चिंतन किया।
👉 इस काल ने भारत को आध्यात्मिकता और विज्ञान का आधार दिया।
वैदिक काल : ज्ञान, धर्म और सभ्यता की नींव
1) काल-विभाजन और भू-परिदृश्य
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काल-विभाजन:
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प्रारम्भिक वैदिक (c. 1500–1000 ई.पू.) – ऋग्वैदिक समाज; पशुपालन-केंद्रित अर्थव्यवस्था; सप्त-सिंधु (पंजाब–सिंध) क्षेत्र में बसावट।
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उत्तर वैदिक (c. 1000–600 ई.पू.) – गंगा-यमुना दोआब तक विस्तार; कृषि, लौह-उपकरण, बड़े यज्ञ और जटिल सामाजिक-राजनीतिक संस्थाएँ।
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जन से जनपद तक: ‘जन’ (त्राइब) आधारित बस्तियों से कुरु-पाँचाल, कोसल, काशी, विदेह जैसे शक्तिशाली जनपदों का उदय।
2) वैदिक साहित्य : ज्ञान की धारा
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चार वेद: ऋग्वेद (स्तुति/सूक्त), सामवेद (गान/संगीत), यजुर्वेद (यज्ञ-प्रक्रिया), अथर्ववेद (गृह व सामाजिक अनुष्ठान, रोग-निवारण आदि)।
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ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद:
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ब्राह्मण – यज्ञों की दार्शनिक व्याख्या।
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आरण्यक – वन-वास में चिंतन हेतु ग्रंथ।
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उपनिषद – ब्रह्म-आत्मा, ऋत (कॉस्मिक ऑर्डर), कर्म, मोक्ष पर चिंतन; गर्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी परंपरा यहीं दिखती है।
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वेदाङ्ग (उच्चारण—शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, कल्प, ज्योतिष, छन्द) – मौखिक परंपरा की शुद्धता और अध्ययन-पद्धति को आकार देते हैं।
3) समाज और जीवन-पद्धति
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वर्ण-व्यवस्था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—कार्य-विभाजन का आदर्श; उत्तर वैदिक काल में कठोरता बढ़ी।
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कुटुम्ब और स्त्री-स्थिति: पितृसत्तात्मक परिवार, गोत्र पर बल; प्रारम्भिक वैदिक में स्त्रियों को यज्ञ, शिक्षा और चर्चा में कुछ भागीदारी—गर्गी-मैत्रेयी इसका उदाहरण।
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आश्रम-व्यवस्था (उत्तर वैदिक): ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास—जीवन को चार चरणों में समझने की कल्पना।
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नैतिक मूल्य: सत्य, अहिंसा (यज्ञ-प्रसंग से अलग व्यापक जीवन-मूल्य), दान, अतिथि-देवो-भव जैसे आदर्श।
4) राज्य व शासन
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राजन और सभाएँ: ‘राजन्’ प्रमुख; पुरोहित (वसिष्ठ/विश्वामित्र जैसे आचार्य) प्रभावशाली; सभा और समिति जैसी जन-परिषदें निर्णय में सहायक।
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प्रशासनिक इकाइयाँ: विश्व, ग्राम, कुल; बलि (कर/उपहार); सैनिक संगठन, रथ-युद्ध, घोड़े-हाथी का प्रयोग।
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राजसूय, अश्वमेध: वैधता और प्रभुत्व दर्शाने वाले बड़े अनुष्ठान—शक्ति, सामर्थ्य और संसाधन-संगठन के प्रतीक।
5) अर्थव्यवस्था: पशुपालन से कृषि-विस्तार
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प्रारम्भिक चरण: गौ-सम्पदा (धन/समृद्धि का मानक), बार्टर (वस्तु-विनिमय), निष्क (सोने के आभूषण) का लेनदेन में उपयोग।
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उत्तर वैदिक परिवर्तन:
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लौह औजारों से जंगल-सफ़ाया और जोत-क्षेत्र बढ़े।
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धान-गेहूँ की फसलों का प्रसार, सिंचाई/बांध की शुरुआती समझ।
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हस्तशिल्प (धातु-कर्म, वस्त्र, मृद्भाण्ड) और आन्तरिक व्यापार का विकास; नगरों के बीज।
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6) धर्म, यज्ञ और दार्शनिक उत्कर्ष
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देव-समूह: इंद्र (वीरता/वज्र), अग्नि (यज्ञ/मध्यस्थ), वरुण (ऋत-नियम), सोम, सूर्य, उषस् आदि।
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यज्ञ-संस्कृति: अग्निहोत्र से सोम-यज्ञ तक—समुदाय, अनुशासन और दान-परंपरा का प्रशिक्षण; उत्तर वैदिक में यज्ञ जटिल व संसाधन-गहन हुए।
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दार्शनिक मोड़: अत्यधिक कर्मकाण्ड के बरक्स उपनिषदों में आत्म-अन्वेषण—“ब्रह्म क्या है? मनुष्य का लक्ष्य क्या है?”—यहीं से आगे चलकर श्रामण परंपराएँ (बौद्ध-जैन) उभरने की पृष्ठभूमि बनती है।
7) शिक्षा, विज्ञान और ज्ञान-पद्धति
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गुरुकुल परंपरा: मौखिक श्रुति-स्मृति—उच्चारण-शुद्धि, छन्द, अर्थ-विवेचन पर कठोर अभ्यास; गुरु-शिष्य बंध।
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भाषा/व्याकरण: वैदिक संस्कृत—सूक्ष्म ध्वन्यात्मक नियम; आगे चलकर वेदाङ्ग-व्याकरण और पाणिनि की परंपरा का मार्ग प्रशस्त।
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ज्योतिष व खगोल: वेदाङ्ग-ज्योतिष में नक्षत्रों का क्रम, यज्ञ-समय निर्धारण, पंचांग-निर्माण की आरंभिक रूपरेखा।
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गणित/ज्यामिति: शुल्बसूत्र (यज्ञ-वेदियों की रचना हेतु) में रेखांकन, समकोण त्रिकोण का नियम, तथा 2\sqrt{2} का काफ़ी सटीक सन्निकटन—व्यवहारिक गणित की उत्कृष्ट मिसाल।
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चिकित्सा: अथर्ववेद में औषधि-ज्ञान, रोग-निवारण मन्त्र और जड़ी-बूटी-प्रयोग; यहीं से आगे चलकर आयुर्वेदिक परंपरा व्यवस्थित होती है।
8) कला, संगीत और सौन्दर्य-बोध
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सामवेद और संगीत: मंत्र-स्वर, गान-परंपरा और लयबद्ध उच्चारण—भारतीय संगीत-संस्कृति की आरंभिक प्रेरणा।
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नृत्य/वाद्य: वीणा जैसे वाद्य, अनुष्ठानिक नृत्य-अवसर; सौंदर्य-बोध का जुड़ाव धर्म-अनुष्ठानों से।
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स्थापत्य-चिन्ता: अग्नि-वेदियों का वैदिक ज्यामिति से निर्माण—आकृतियाँ (पक्षी/कछप रूप) और सटीक माप-तौल।
9) शौर्य, महिमा और महानता—आदर्शों का सम्मेलन
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वीरता: प्रकृति-विपदाओं, प्रतिद्वन्द्वी जनों और अनिश्चितताओं के बीच रक्षण-व्यवस्था; रथ-विद्या और रण-कौशल।
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महिमा: यज्ञों का सुव्यवस्थित आयोजन—संसाधन-संयोजन, नेतृत्व और अनुशासन का सार्वजनिक प्रदर्शन।
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महानता: ऋत-धर्म-सत्य पर आधारित नैतिक संसार—जहाँ ज्ञान, दान, अतिथि-सेवा और समाज-हित को सर्वोच्च स्थान।
10) इस काल की विरासत—भारत को मिला क्या?
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आध्यात्मिक नींव: ब्रह्म-आत्मा, कर्म-मोक्ष, धर्म-श्रद्धा—भारतीय चिंतन की आधार-शिला।
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ज्ञान-परंपरा: मौखिक शिक्षा-तंत्र, छन्द-व्यवस्था, ज्यामिति-खगोल का आरंभिक ढाँचा।
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सामाजिक-राजनीतिक संस्थाएँ: सभा-समिति से जनपदों तक—लोक-सहभागिता और शासकीय वैधता की संवेदना।
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संस्कृति-सततता: भाषा, संगीत, अनुष्ठान, पर्व-उत्सव—आज तक चलती सांस्कृतिक लय का आद्य रूप।
त्वरित समयरेखा (1500–600 ई.पू.)
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c. 1500–1200: ऋग्वैदिक सूक्त, सप्त-सिंधु के जन-समूह, पशुपालन प्रधानता।
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c. 1200–1000: पूर्व की ओर विस्तार, कृषि-वृद्धि के संकेत, सभा-समिति की सक्रियता।
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c. 1000–800: लौह-उपकरण, बड़े यज्ञ, कुरु-पाँचाल का उत्कर्ष, ब्राह्मण/आरण्यक रचना।
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c. 800–600: उपनिषदिक चिंतन का उभार, वेदाङ्गों का विन्यास, जनपदों की सुदृढ़ता—आगे चलकर महाजनपद युग की पृष्ठभूमि।
⚔️ महाजनपद और मगध साम्राज्य
600 ई.पू. से 321 ई.पू. के बीच भारत में 16 महाजनपद स्थापित हुए।
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मगध, कोसल, वत्स और अवंति प्रमुख थे।
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मगध की शक्ति से ही आगे चलकर मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ।
इसी काल में महात्मा गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी ने जन्म लेकर भारत को अहिंसा, करुणा और सत्य का संदेश दिया।
1. वैदिक काल और उत्तरवैदिक समाज
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वैदिक काल (1500 ई.पू. – 600 ई.पू.) भारतीय इतिहास की वह अवधि है जिसमें वैदिक सभ्यता का विकास हुआ।
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प्रारंभिक वैदिक काल में (ऋग्वैदिक काल) समाज जनजातीय स्वरूप का था। राजा को केवल मुखिया माना जाता था और सत्ता सीमित थी।
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उत्तर वैदिक काल (1000 ई.पू. – 600 ई.पू.) तक आते-आते समाज में परिवर्तन हुए। कृषि उत्पादन बढ़ा, लोहे के उपयोग से खेती और युद्ध दोनों में शक्ति आई।
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इसी समय से छोटे-छोटे जनपद (क्षेत्रीय राज्यों) का विकास हुआ और धीरे-धीरे वे महाजनपदों में परिवर्तित हो गए।
2. महाजनपदों का उदय (600 ई.पू. – 321 ई.पू.)
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600 ई.पू. के आसपास भारत में 16 महाजनपद स्थापित हुए। इनका उल्लेख अंगुत्तर निकाय (बौद्ध ग्रंथ) और महाभारत में मिलता है।
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ये महाजनपद मुख्यतः गंगा के मैदान और उसके आसपास केंद्रित थे, क्योंकि यह क्षेत्र उपजाऊ, जल से सम्पन्न और व्यापार के लिए उपयुक्त था।
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इन महाजनपदों के नाम थे:
अंग, मगध, कोसल, वत्स, अवंति, काशी, कुरु, पांचाल, शूरसेन, मल्ल, वज्जि (लिच्छवि), चेदि, अस्मक, मद्र, गंधार और कम्बोज।
3. प्रमुख महाजनपद
(i) मगध
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यह सबसे शक्तिशाली महाजनपद के रूप में उभरा।
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प्रारंभिक राजधानी राजगीर और बाद में पाटलिपुत्र बनी।
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यहाँ के प्रमुख शासक:
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बिंबिसार (हर्यक वंश) – अंग राज्य को मिलाकर मगध का विस्तार किया।
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अजातशत्रु – कोसल और वज्जि गणराज्य को हराकर मगध को सबसे मजबूत बनाया।
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शिशुनाग वंश – राजधानी को वैशाली से पाटलिपुत्र लाया।
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नंद वंश – महापद्म नंद ने कई राज्यों को जीतकर मगध को सबसे विशाल साम्राज्य बना दिया।
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मगध की शक्ति के कारण ही आगे चलकर मौर्य साम्राज्य (चन्द्रगुप्त मौर्य, 321 ई.पू.) का उदय हुआ।
(ii) कोसल
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राजधानी श्रावस्ती।
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शासक प्रसेनजित बुद्धकालीन समय में प्रसिद्ध था।
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यह बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा।
(iii) वत्स
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राजधानी कौशाम्बी।
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यहाँ के शासक उदयिन और अजातशत्रु के बीच कई युद्ध हुए।
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व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था।
(iv) अवंति
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राजधानी उज्जयिनी।
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यह पश्चिम भारत का सबसे प्रभावशाली राज्य था और ग्रीक (यूनानी) व्यापारियों से संपर्क में भी आया।
4. सामाजिक और धार्मिक परिप्रेक्ष्य
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इस काल में समाज में जाति व्यवस्था कठोर होने लगी थी।
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अत्यधिक यज्ञों और कर्मकांडों से जनसाधारण असंतुष्ट होने लगा।
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इसी पृष्ठभूमि में नवधर्मिक आंदोलनों का उदय हुआ।
5. बौद्ध और जैन धर्म का उदय
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महात्मा बुद्ध (563 ई.पू. – 483 ई.पू.) का जन्म लुंबिनी (शाक्य गणराज्य) में हुआ।
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उन्होंने सारनाथ में प्रथम उपदेश देकर धर्मचक्र प्रवर्तन किया।
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उनका संदेश था – अहिंसा, मध्यम मार्ग, करुणा और सत्य।
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बुद्ध ने कर्मकांडों और जाति भेद को अस्वीकार किया।
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महावीर स्वामी (599 ई.पू. – 527 ई.पू.) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे।
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उनका जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ।
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उन्होंने अहिंसा, अपरिग्रह और सत्य का उपदेश दिया।
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कठोर तपस्या और संयम पर बल दिया।
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6. मगध साम्राज्य और मौर्यों की नींव
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नंद वंश के बाद मगध का प्रशासन और सेना इतनी शक्तिशाली हो गई थी कि यूनानी सेनापति सिकंदर भी पूर्वी भारत तक नहीं बढ़ सका।
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321 ई.पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की मदद से नंद वंश को पराजित किया और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
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इस प्रकार, महाजनपद काल का समापन मौर्य साम्राज्य के उदय के साथ हुआ।
7. निष्कर्ष
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600 ई.पू. से 321 ई.पू. का समय भारतीय इतिहास में राजनीतिक संगठन, धार्मिक क्रांति और सांस्कृतिक विकास का काल था।
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16 महाजनपदों में से मगध सबसे शक्तिशाली निकला और मौर्य साम्राज्य की नींव बनी।
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इसी काल में बुद्ध और महावीर जैसे महापुरुषों ने जन्म लेकर भारत और विश्व को अहिंसा, करुणा, सत्य और शांति का संदेश दिया।
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यही वह काल है जिसने आगे चलकर भारत की महान परंपराओं – धर्म, राजनीति और संस्कृति – की मजबूत नींव रखी।
🦁 मौर्य साम्राज्य – भारत की पहली महान शक्ति
321 ई.पू. में चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश को पराजित कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
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उनके गुरु चाणक्य (कौटिल्य) ने अर्थशास्त्र लिखकर राजनीति, अर्थशास्त्र और कूटनीति का अद्वितीय ज्ञान दिया।
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बिंदुसार के बाद अशोक महान (273–232 ई.पू.) ने राजगद्दी संभाली।
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कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने हिंसा छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया और “धम्म नीति” के द्वारा शासन किया।
👉 अशोक का साम्राज्य भारत से लेकर अफगानिस्तान और श्रीलंका तक फैला था।
👉 मौर्य साम्राज्य ने भारत को एकता, प्रशासन और वैश्विक पहचान दी।
📜 मौर्य साम्राज्य – भारत की पहली महान शक्ति (321 ई.पू.–185 ई.पू.)
भारत के प्राचीन इतिहास में मौर्य साम्राज्य एक ऐसा अध्याय है जिसने भारत को पहली बार राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक एकता प्रदान की। यह साम्राज्य न केवल अपने शक्तिशाली शासकों और संगठित प्रशासन के लिए जाना जाता है, बल्कि इसकी नीति, कला, धर्म और अंतरराष्ट्रीय संबंधों ने भारत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई। आइए इसे विस्तारपूर्वक समझते हैं।
🏛 मौर्य साम्राज्य की स्थापना
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321 ई.पू. में चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित कर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
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इस क्रांति के पीछे चाणक्य (कौटिल्य/विष्णुगुप्त) का बड़ा हाथ था।
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चाणक्य ने अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र के माध्यम से शासन, राजनीति, कूटनीति और युद्धनीति का ऐसा अद्वितीय ज्ञान दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।
👉 चंद्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी ने भारत के इतिहास की धारा ही बदल दी।
👑 चंद्रगुप्त मौर्य (321–297 ई.पू.)
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चंद्रगुप्त ने नंद वंश के पतन के बाद मगध को राजधानी बनाकर साम्राज्य का विस्तार शुरू किया।
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उन्होंने सेल्यूकस निकेटर (सिकंदर के उत्तराधिकारी) को पराजित किया और उनसे पश्चिमी भारत के क्षेत्र प्राप्त किए।
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इस युद्ध के बाद सेल्यूकस ने अपनी बेटी का विवाह चंद्रगुप्त से किया और उन्हें यवनी (यूनानी) दूत मेगस्थनीज को पाटलिपुत्र भेजना पड़ा।
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मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक “इंडिका” में मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, नगर-योजना और सामाजिक जीवन का विस्तृत वर्णन किया है।
प्रशासन की विशेषताएँ:
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राजा सर्वोच्च लेकिन सलाहकारों के साथ शासन करता था।
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मंत्रिपरिषद और अधिकारी वर्ग बेहद संगठित थे।
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सेना विशाल और सुसंगठित थी – इसमें पैदल सैनिक, घुड़सवार, हाथी और रथ शामिल थे।
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पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी थी, जिसे उस समय का सबसे बड़ा और सुंदर नगर माना जाता था।
👉 चंद्रगुप्त ने भारत को पहली बार एक राजनीतिक शक्ति के रूप में एकजुट किया।
👑 बिंदुसार (297–273 ई.पू.)
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चंद्रगुप्त के बाद उनके पुत्र बिंदुसार गद्दी पर बैठे।
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यूनानी स्रोतों में उन्हें “अमित्रघात” (शत्रुओं का संहारक) कहा गया है।
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बिंदुसार ने दक्षिण भारत के कर्नाटक तक साम्राज्य का विस्तार किया।
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वह एक महान शासक और कूटनीतिज्ञ थे, लेकिन उनका काल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा।
👑 अशोक महान (273–232 ई.पू.)
मौर्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक अशोक महान थे। उन्होंने साम्राज्य को उसकी सर्वोच्च सीमा तक पहुँचाया और भारत के इतिहास में अमर हो गए।
🗡 कलिंग युद्ध और परिवर्तन
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261 ई.पू. में अशोक ने कलिंग (आधुनिक ओडिशा) पर आक्रमण किया।
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इस युद्ध में लगभग एक लाख लोग मारे गए और डेढ़ लाख लोग बंदी बनाए गए।
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नरसंहार और रक्तपात देखकर अशोक के हृदय में गहरी पीड़ा हुई।
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इसके बाद उन्होंने हिंसा का मार्ग त्याग दिया और बौद्ध धर्म अपनाया।
👉 कलिंग युद्ध के बाद का यह परिवर्तन उन्हें “चंड अशोक” से “धम्म अशोक” बना गया।
🌏 अशोक का साम्राज्य
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अशोक का साम्राज्य भारत से लेकर अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका तक फैला था।
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यह उस समय का विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था।
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उन्होंने धम्म नीति (नैतिकता, सत्य, करुणा और सहिष्णुता पर आधारित शासन) अपनाई।
📜 अशोक की धम्म नीति
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सभी धर्मों का सम्मान।
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प्रजा की भलाई, चिकित्सा, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर जोर।
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शिकार और बलि जैसी क्रूर प्रथाओं पर नियंत्रण।
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अधिकारी वर्ग को आदेश कि वे जनता से सीधे संवाद करें और उनकी समस्याएँ सुनें।
👉 अशोक ने शासन को केवल शक्ति और युद्ध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवता और करुणा से जोड़ दिया।
🪨 अशोक के शिलालेख
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अशोक ने अपने आदेश पत्थरों, स्तंभों और गुफाओं पर खुदवाए।
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ये शिलालेख ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों में लिखे गए थे।
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इनमें अहिंसा, धर्म सहिष्णुता और सामाजिक नैतिकता का संदेश मिलता है।
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दिल्ली, सारनाथ, सांची, लौहित (नेपाल), और कनिष्क (अफगानिस्तान) में उनके स्तंभ आज भी खड़े हैं।
🕊 बौद्ध धर्म का प्रसार
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अशोक ने बौद्ध धर्म को राज्य का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाया।
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उन्होंने धर्ममहामात्रों की नियुक्ति की जो प्रजा को नैतिक शिक्षा देते थे।
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बौद्ध धर्म को श्रीलंका, अफगानिस्तान, मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचाया।
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उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संगमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
👉 अशोक के प्रयासों से बौद्ध धर्म एक वैश्विक धर्म बन गया।
🎨 मौर्य कला और स्थापत्य
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अशोक स्तंभ (सारनाथ का सिंह स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है)।
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सांची स्तूप, बाराबर गुफाएँ, लौहित स्तंभ – ये सभी मौर्यकालीन कला की महान धरोहर हैं।
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मौर्य काल में पत्थर काटने और चमकाने की कला अपने शिखर पर पहुँची।
📉 मौर्य साम्राज्य का पतन (185 ई.पू.)
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अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर होने लगा।
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उत्तराधिकारी शासक अशोक जितने सक्षम नहीं थे।
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प्रांतीय शासक स्वतंत्र होने लगे और प्रशासन शिथिल पड़ गया।
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अंततः 185 ई.पू. में बृहद्रथ (मौर्य वंश का अंतिम शासक) को उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मारकर मौर्य वंश का अंत कर दिया।
✨ मौर्य साम्राज्य की महत्ता
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भारत को पहली बार राजनीतिक एकता मिली।
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संगठित प्रशासन और सेना का विकास हुआ।
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कला, स्थापत्य और साहित्य का उत्कर्ष हुआ।
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अशोक के माध्यम से बौद्ध धर्म का वैश्विक प्रसार हुआ।
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भारत विश्व राजनीति और संस्कृति में एक महाशक्ति बनकर उभरा।
🔑 निष्कर्ष
मौर्य साम्राज्य केवल एक राजनीतिक शक्ति नहीं था, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्रांति का प्रतीक था।
चंद्रगुप्त और चाणक्य ने जहाँ साम्राज्य की नींव रखी, वहीं अशोक महान ने इसे नैतिकता, करुणा और मानवता के उच्चतम आदर्शों तक पहुँचाया।
👉 इसलिए मौर्य साम्राज्य को भारतीय इतिहास की पहली और सबसे महान शक्ति कहा जाता है।
🕉️ गुप्त साम्राज्य – भारत का स्वर्ण युग
गुप्त वंश (319 ई.–550 ई.) को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।
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समुद्रगुप्त ने अपनी वीरता से कई राज्यों को जीतकर विशाल साम्राज्य बनाया।
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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (चंद्रगुप्त द्वितीय) कला, साहित्य और विज्ञान के महान संरक्षक थे।
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उनके दरबार में नवरत्न थे – कालिदास (कवि), वराहमिहिर (खगोलज्ञ), आर्यभट्ट (गणितज्ञ), धन्वंतरि (चिकित्सक) आदि।
👉 इस काल में विज्ञान, गणित (शून्य का सिद्धांत), खगोल, कला, मूर्तिकला और साहित्य में अद्वितीय प्रगति हुई।
👉 यही कारण है कि इसे भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।
गुप्त साम्राज्य – भारत का स्वर्ण युग
गुप्त वंश भारतीय इतिहास का वह अद्भुत काल है जिसे “स्वर्ण युग” कहा जाता है। यह समय न केवल राजनीतिक शक्ति और स्थिरता का प्रतीक था, बल्कि कला, साहित्य, विज्ञान, गणित, धर्म और संस्कृति के उच्चतम उत्कर्ष का भी काल था।
1) स्थापना और प्रमुख शासक
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गुप्त वंश का उदय लगभग 319 ई. में श्रीगुप्त से हुआ।
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वास्तविक विस्तार की शुरुआत चंद्रगुप्त प्रथम (319–335 ई.) से हुई, जिन्होंने लिच्छवि राजकुमारी से विवाह कर साम्राज्य को मजबूती दी।
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समुद्रगुप्त (335–375 ई.) – “भारत का नेपोलियन” कहे जाने वाले इस वीर सम्राट ने असंख्य राज्यों को जीतकर गुप्त साम्राज्य को उत्तरी, मध्य और दक्षिण भारत तक फैला दिया।
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चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375–415 ई.) – कला, साहित्य और विज्ञान के महान संरक्षक; उनके काल में साम्राज्य ने सांस्कृतिक और आर्थिक चरमोत्कर्ष प्राप्त किया।
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उत्तराधिकारियों में कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त शामिल थे, जिन्होंने हूण आक्रमणों का सामना किया।
2) प्रशासन और शासन-व्यवस्था
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राजतंत्र – सम्राट सर्वोच्च, परंतु प्रांतीय शासन में कुशल व्यवस्था।
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प्रांतीय इकाइयाँ – “भुक्ति” (प्रांत), “विषय” (जिला), “ग्राम” (गाँव) – हर स्तर पर अधिकारी नियुक्त।
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नगर प्रशासन – नगराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, सेना प्रमुख, न्यायाधिकारी आदि पद।
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कर प्रणाली – भूमि-कर, व्यापार-शुल्क और अन्य राजस्व स्रोतों से आय।
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न्याय व्यवस्था में धर्मशास्त्र और परंपरा का पालन।
3) सैन्य शक्ति और विजयों
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समुद्रगुप्त की “प्रयाग प्रशस्ति” (इलाहाबाद स्तंभ लेख) से उनकी दक्षिण और उत्तर भारत में की गई विजयों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
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उन्होंने शक्तिशाली राज्यों को पराजित कर मित्र राज्यों और आश्रित राज्यों की नीति अपनाई।
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साम्राज्य की सीमाएँ बंगाल से अफगानिस्तान तक और हिमालय से नर्मदा तक फैलीं।
4) सांस्कृतिक स्वर्ण युग
(क) साहित्य और विद्या
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नवरत्न:
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कालिदास – संस्कृत साहित्य के महान कवि (“अभिज्ञान शाकुंतलम्”, “मेघदूत”)।
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आर्यभट्ट – गणितज्ञ व खगोलज्ञ (शून्य का सिद्धांत, पाई का मान, ग्रहों की गति का सिद्धांत)।
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वराहमिहिर – ज्योतिष और खगोल विज्ञान के ज्ञाता (“बृहत्संहिता”)।
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धन्वंतरि – आयुर्वेदाचार्य।
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अन्य: अमरसिंह, घटकर्पर, शंख, विश्वनाथ आदि।
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संस्कृत साहित्य – नाट्य, काव्य और गद्य में अद्भुत प्रगति।
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विद्या केंद्र – नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला जैसी शिक्षा-परंपरा की नींव।
(ख) विज्ञान और गणित
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शून्य का सिद्धांत और दशमलव पद्धति का विकास।
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आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और ग्रहों की गति सूर्य के चारों ओर होती है।
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खगोल विज्ञान में नक्षत्र, ग्रहण, समय-गणना में सटीकता।
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चिकित्सा – शल्यचिकित्सा, औषधि विज्ञान और रोग-निदान में प्रगति।
(ग) कला और स्थापत्य
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मूर्तिकला – बौद्ध, जैन और हिंदू मूर्तियों में यथार्थवाद और सौंदर्य का अद्भुत संगम।
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अजंता की गुफाएँ – भित्ति-चित्रों में जीवन, धर्म और प्रकृति का अद्भुत चित्रण।
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मंदिर स्थापत्य – दशावतार मंदिर (देवगढ़), विष्णु और शिव के भव्य मंदिर।
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स्वर्ण-मुद्राएँ – उच्च कला कौशल के प्रतीक; सिक्कों पर सम्राट और देवी-देवताओं के चित्र।
5) धर्म और समाज
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धर्म – हिंदू धर्म का पुनरुत्थान; वैष्णव और शैव भक्ति का प्रसार।
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म को भी संरक्षण।
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समाज में वर्ण व्यवस्था मौजूद, लेकिन शिक्षा और कला में खुलापन।
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महिलाएँ शिक्षा, साहित्य और कला में सक्रिय भूमिका निभाती थीं।
6) आर्थिक समृद्धि
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कृषि – सिंचाई और उपजाऊ भूमि पर आधारित।
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व्यापार – आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार; रोमन साम्राज्य, दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका तक संपर्क।
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मुद्राएँ – स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्रा का प्रचलन।
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हस्तशिल्प – वस्त्र, धातु-कला, आभूषण निर्माण में विश्व-स्तरीय कौशल।
7) पतन के कारण
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हूण आक्रमण (स्कंदगुप्त के बाद) से साम्राज्य की शक्ति कमजोर हुई।
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विशाल साम्राज्य का प्रशासनिक विघटन और उत्तराधिकारी शासकों की कमजोरी।
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प्रांतीय स्वायत्तता और बाहरी आक्रमणों ने गुप्त सत्ता को समाप्त किया।
8) स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है?
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राजनीतिक एकता और स्थिरता।
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कला, साहित्य, विज्ञान, गणित, खगोल, चिकित्सा और स्थापत्य में विश्व-स्तरीय योगदान।
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आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक उत्कर्ष।
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धार्मिक सहिष्णुता और शिक्षा केंद्रों का विकास।
निष्कर्ष
गुप्त साम्राज्य केवल एक राजनीतिक सत्ता नहीं था, बल्कि यह भारतीय सभ्यता के वैभव और प्रतिभा का प्रतीक था। इस काल में प्राप्त ज्ञान, कला और विज्ञान की उपलब्धियाँ आज भी विश्व को प्रेरणा देती हैं। इसलिए इसे सही अर्थों में भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है। भारतीय इतिहास शौर्य महिमा और महानता की गाथा Indian history is a tale of valor glory and greatness
🛡️ राजपूत काल – शौर्य और पराक्रम
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद (7वीं–12वीं सदी) राजपूत वंश का उदय हुआ।
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प्रतिहार, चौहान, परमार, सोलंकी जैसे राजवंशों ने शौर्य और पराक्रम से भारत की रक्षा की।
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पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी से कई युद्ध लड़े और उनकी वीरता अमर हो गई।
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इस काल में मंदिर निर्माण, किले और शिल्पकला का अद्भुत विकास हुआ।
👉 राजपूत काल भारत की शौर्यगाथा और संस्कृति की रक्षा का प्रतीक है।
राजपूत काल – शौर्य और पराक्रम
1. गुप्त साम्राज्य का पतन और राजपूतों का उदय
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गुप्त साम्राज्य (4थी से 6ठी सदी) के पतन के बाद भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई।
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उत्तर भारत में छोटे-छोटे राज्य बनने लगे।
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इसी अव्यवस्था के बीच राजपूत वंशों का उदय हुआ, जिन्होंने 7वीं से 12वीं सदी तक उत्तर और पश्चिम भारत की रक्षा और शासन किया।
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“राजपूत” शब्द संस्कृत के राजपुत्र (राजा का पुत्र) से निकला है। ये योद्धा, वीरता, धर्म और मर्यादा के प्रतीक बने।
2. प्रमुख राजपूत वंश
राजपूत काल में कई शक्तिशाली वंश हुए, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं –
(i) गुर्जर-प्रतिहार वंश (7वीं – 11वीं सदी)
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राजधानी: कन्नौज
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संस्थापक: नागभट्ट प्रथम
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इनका सबसे महान शासक: मिहिर भोज (836–885 ई.)
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प्रतिहारों ने अरब आक्रमणकारियों को कई बार पराजित किया और उत्तर-पश्चिम से भारत की रक्षा की।
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इनके कारण अरब भारत में गहराई तक प्रवेश नहीं कर सके।
(ii) चौहान वंश
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चौहान वंश का उदय राजस्थान में हुआ।
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सबसे प्रसिद्ध शासक: पृथ्वीराज चौहान (1177–1192 ई.)
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पृथ्वीराज चौहान ने तराइन के युद्ध (1191 ई.) में मुहम्मद गोरी को हराया।
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किंतु दूसरे तराइन युद्ध (1192 ई.) में छल से हार गए।
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उनकी वीरता, देशभक्ति और प्रेमकथा (संयोगिता के साथ) आज भी अमर है।
(iii) परमार वंश
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राजधानी: धार (मध्यप्रदेश)
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सबसे महान शासक: राजा भोज (1010–1055 ई.)
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भोज न केवल योद्धा थे, बल्कि साहित्य, कला और शिक्षा के महान संरक्षक भी थे।
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उन्होंने अनेक मंदिर, तालाब और विद्यालय बनवाए।
(iv) सोलंकी (चालुक्य) वंश
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यह वंश गुजरात में शक्तिशाली था।
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प्रमुख शासक: भीमदेव प्रथम और कर्णदेव
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सोलंकियों के समय में मोडेरा का सूर्य मंदिर (गुजरात) और कई अद्भुत स्थापत्य कला के नमूने बने।
3. राजपूतों का शौर्य और पराक्रम
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राजपूत योद्धाओं के लिए युद्ध केवल विजय प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि मर्यादा और धर्म की रक्षा का मार्ग था।
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वे “युद्ध में वीरगति” को सबसे बड़ा सम्मान मानते थे।
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उन्होंने अरब, तुर्क और अफगान आक्रमणकारियों से भारत की सीमाओं की रक्षा की।
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पृथ्वीराज चौहान, भोजराज परमार, बप्पा रावल (गहलोत वंश, मेवाड़) जैसे वीर शासक भारतीय शौर्यगाथा के प्रतीक बन गए।
4. राजपूत काल में संस्कृति और कला
राजपूत केवल योद्धा ही नहीं थे, बल्कि कला, स्थापत्य और संस्कृति के महान संरक्षक भी थे।
(i) मंदिर निर्माण
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इस काल में उत्तर और पश्चिम भारत में अद्भुत मंदिर बने।
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प्रमुख उदाहरण:
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खजुराहो के मंदिर (परमार वंश)
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दिलवाड़ा के जैन मंदिर (सोलंकी वंश)
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मोडेरा का सूर्य मंदिर
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कालीका माता मंदिर (चौहान वंश)
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(ii) किले और दुर्ग
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राजपूतों ने सुरक्षा के लिए विशाल किले बनाए।
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राजस्थान के किले जैसे – चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथंभौर और जालौर इनके शौर्य की गाथा कहते हैं।
(iii) शिल्पकला और साहित्य
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राजपूत शासकों ने काव्य, नाटक और इतिहास लेखन को प्रोत्साहित किया।
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पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई रचित) इस काल की अमूल्य रचना है।
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कला में शिल्प, मूर्तिकला और चित्रकला का विकास हुआ।
5. स्त्री सम्मान और जौहर परंपरा
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राजपूत समाज में स्त्रियों का उच्च स्थान था।
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संकट के समय राजपूत स्त्रियाँ जौहर (आत्माहुति) कर लेती थीं ताकि शत्रु के हाथों अपमानित न हों।
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यह परंपरा उनके अदम्य साहस और आत्मसम्मान का प्रतीक है।
6. राजपूत काल का ऐतिहासिक महत्व
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राजपूत काल भारत की शौर्यगाथा का युग था।
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उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों को लंबे समय तक भारत से दूर रखा।
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साथ ही मंदिरों, किलों और शिल्पकला से भारत की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध किया।
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यद्यपि राजपूतों की सबसे बड़ी कमजोरी आपसी ऐक्य की कमी थी। यदि वे संगठित होते तो विदेशी आक्रमणकारी कभी भारत पर स्थायी अधिकार नहीं कर पाते।
7. निष्कर्ष
राजपूत काल भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है।
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यह केवल युद्ध और वीरता का काल नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और कला की रक्षा का युग भी था।
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पृथ्वीराज चौहान, मिहिर भोज, राजा भोज, बप्पा रावल जैसे नायक आज भी भारतीय जनमानस में अमर हैं।
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उनके बनाए मंदिर, किले और स्थापत्य आज भी भारतीय शौर्य और संस्कृति की गाथा सुनाते हैं।
👉 इस प्रकार, राजपूत काल को हम “भारतीय शौर्य, पराक्रम और संस्कृति की रक्षा का स्वर्णिम युग” कह सकते हैं।
🕌 दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य
दिल्ली सल्तनत (1206–1526)
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कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम वंश की स्थापना की।
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अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक ने भारत में प्रशासनिक और आर्थिक सुधार किए।
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वास्तुकला जैसे कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा इस काल की देन हैं।
मुगल साम्राज्य (1526–1857)
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बाबर ने पानीपत के युद्ध (1526) में इब्राहीम लोदी को हराया।
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अकबर महान (1556–1605) ने साम्राज्य को स्थिर किया और “सुलह-ए-कुल” की नीति अपनाई।
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शाहजहाँ ने ताजमहल जैसे अद्वितीय स्थापत्य का निर्माण कराया।
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औरंगज़ेब के समय साम्राज्य विस्तृत तो हुआ, लेकिन धार्मिक असहिष्णुता से कमजोर भी हुआ।
👉 मुगलों ने भारत की कला, स्थापत्य, संगीत और संस्कृति को नई ऊँचाई दी।
🕌 दिल्ली सल्तनत (1206 – 1526 ई.)
भारत में इस्लामी शासन की जड़ें ग़ज़नवी और मोहम्मद ग़ोरी के आक्रमणों से पड़ीं। लेकिन स्थायी मुस्लिम शासन की शुरुआत हुई जब 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम वंश (Slave Dynasty) की स्थापना की।
🔹 गुलाम वंश (1206 – 1290 ई.)
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कुतुबुद्दीन ऐबक, जो मोहम्मद ग़ोरी का दास और सेनापति था, दिल्ली का शासक बना।
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उसने कुतुब मीनार की नींव रखी।
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उसके बाद इल्तुतमिश आया, जिसने शासन को स्थिर किया और दिल्ली सल्तनत को मान्यता दिलाई।
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रज़िया सुल्ताना (1236–1240) भारत की पहली महिला शासक बनीं, लेकिन दरबार की राजनीति के कारण उनका अंत दुखद हुआ।
🔹 खिलजी वंश (1290 – 1320 ई.)
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जलालुद्दीन खिलजी ने सत्ता संभाली, लेकिन वास्तविक विस्तारवादी नीति अलाउद्दीन खिलजी के समय में दिखी।
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अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोल आक्रमणों को रोका और दक्षिण भारत तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
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उसने बाजार नियंत्रण और मूल्य नियंत्रण नीति लागू की, जिससे खाद्य वस्तुओं और अनाज के दाम सामान्य जनता के लिए स्थिर रहे।
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उसकी महत्वाकांक्षा ने सल्तनत को सुदृढ़ किया।
🔹 तुगलक वंश (1320 – 1414 ई.)
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ग़यासुद्दीन तुगलक ने राज्य का विस्तार किया।
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मुहम्मद बिन तुगलक को उसकी विचित्र नीतियों के लिए जाना जाता है:
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राजधानी दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित की (जिससे बड़ी जनहानि हुई)।
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तांबे और पीतल के सिक्कों को चाँदी के बराबर मानने का आदेश दिया, जिससे अर्थव्यवस्था बिगड़ गई।
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लेकिन वह दूरदर्शी भी था—उसने सिंचाई, सड़कें और प्रशासनिक ढाँचा मजबूत किया।
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फ़िरोजशाह तुगलक (1351–1388) ने नहरों, बागों और सरायों का निर्माण किया और स्थापत्य को प्रोत्साहित किया।
🔹 सैयद वंश (1414 – 1451 ई.)
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तैमूर लंग के आक्रमण (1398) के बाद दिल्ली कमजोर हुई।
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सैयद वंश के शासक ज्यादा शक्तिशाली नहीं थे और धीरे-धीरे उनकी सत्ता सिकुड़ती चली गई।
🔹 लोदी वंश (1451 – 1526 ई.)
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बहलुल लोदी ने सत्ता संभाली और दिल्ली सल्तनत को पुनर्जीवित किया।
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सिकंदर लोदी ने प्रशासनिक सुधार किए और आगरा को राजधानी बनाया।
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अंतिम शासक इब्राहीम लोदी को 1526 के प्रथम पानीपत युद्ध में बाबर ने पराजित किया और सल्तनत का अंत हो गया।
👉 दिल्ली सल्तनत ने भारत में नई प्रशासनिक प्रणाली, फ़ारसी संस्कृति, स्थापत्य और शहरीकरण को जन्म दिया।
🏰 मुगल साम्राज्य (1526 – 1857 ई.)
🔹 बाबर (1526–1530 ई.)
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बाबर मध्य एशिया का तैमूरी वंशज था।
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उसने 1526 में प्रथम पानीपत युद्ध में इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में मुगलों की नींव रखी।
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वह युद्ध कौशल, तोपख़ाने और संगठित सेना का मास्टर था।
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बाबर ने ‘तुझुक-ए-बाबरी’ नामक आत्मकथा लिखी।
🔹 हुमायूँ (1530–1540, 1555–1556 ई.)
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बाबर का पुत्र हुमायूँ स्थिर शासक नहीं बन पाया।
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शेरशाह सूरी ने उसे हराकर कुछ वर्षों के लिए दिल्ली पर शासन किया।
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शेरशाह ने सड़क व्यवस्था (ग्रैंड ट्रंक रोड), डाक व्यवस्था और मुद्रा सुधार किए।
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1555 में हुमायूँ ने सत्ता वापस ली लेकिन एक साल बाद उसकी मृत्यु हो गई।
🔹 अकबर महान (1556–1605 ई.)
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14 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा और बैरम खाँ ने प्रारंभिक वर्षों में उसका मार्गदर्शन किया।
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दूसरा पानीपत युद्ध (1556) में अकबर ने हेमचंद्र विक्रमादित्य को हराया।
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अकबर ने धीरे-धीरे उत्तर भारत, गुजरात, बंगाल, राजपूताना और दक्कन तक साम्राज्य फैलाया।
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उसकी सुलह-ए-कुल नीति (सर्वधर्म समभाव) ने धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया।
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उसने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चलाने का प्रयास किया।
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कला, साहित्य और स्थापत्य में अकबर का काल स्वर्ण युग था। फतेहपुर सीकरी इसका उदाहरण है।
🔹 जहाँगीर (1605–1627 ई.)
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जहाँगीर अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध था।
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उसने “जहाँगीरी घंटी” लगाई ताकि कोई भी नागरिक सीधे न्याय की गुहार लगा सके।
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उसकी पत्नी नूरजहाँ ने भी राजनीति और कला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🔹 शाहजहाँ (1628–1658 ई.)
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शाहजहाँ का शासन स्थापत्य कला का स्वर्ण युग कहलाता है।
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ताजमहल, लालकिला (दिल्ली), जामा मस्जिद उसकी महान उपलब्धियाँ हैं।
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लेकिन उसके शासन के अंतिम वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता और राजकुमारों के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हुआ।
🔹 औरंगज़ेब (1658–1707 ई.)
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औरंगज़ेब ने साम्राज्य को दक्षिण भारत तक फैलाया।
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लेकिन उसकी धार्मिक असहिष्णु नीतियों (जैसे जज़िया कर की पुनः शुरुआत) ने साम्राज्य की नींव कमजोर की।
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राजपूतों, मराठों, सिखों और अन्य शक्तियों के विद्रोह ने साम्राज्य को अंदर से हिला दिया।
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उसकी मृत्यु के बाद साम्राज्य धीरे-धीरे विघटित हो गया।
🏛 मुगलों की विरासत और योगदान
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कला व स्थापत्य – ताजमहल, लाल किला, फतेहपुर सीकरी, हुमायूँ का मकबरा।
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संस्कृति – फ़ारसी भाषा का प्रसार, हिंदुस्तानी संगीत और चित्रकला का विकास।
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प्रशासन – केंद्रीकृत प्रशासनिक ढाँचा, भूमिसुधार और महसूल व्यवस्था।
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धार्मिक नीति – अकबर की सहिष्णुता ने भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूत किया।
⚔️ मराठा साम्राज्य और वीर शिवाजी
मुगलों के बाद 17वीं सदी में छत्रपति शिवाजी महाराज का उदय हुआ।
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उन्होंने स्वराज की नींव रखी और मराठा शक्ति को संगठित किया।
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उनकी गुरिल्ला युद्ध नीति आज भी विश्वभर में पढ़ाई जाती है।
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मराठा साम्राज्य ने औरंगज़ेब की नीतियों को चुनौती दी और भारत को स्वतंत्रता की भावना दी।
मराठा साम्राज्य और वीर शिवाजी
1) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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17वीं सदी में भारत मुगल साम्राज्य के अधीन था, लेकिन दक्षिण और पश्चिम भारत में मुगलों के साथ-साथ अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा जैसे दक्कन सल्तनतों का प्रभुत्व था।
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इस समय जन-जीवन कठिनाई में था, किसानों पर कर का बोझ और शासकों की कठोर नीतियाँ जनता को असंतुष्ट कर रही थीं।
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ऐसे समय में शिवाजी भोंसले का उदय हुआ, जिन्होंने स्वराज्य (अपने लोगों का अपना शासन) का सपना देखा और उसे साकार किया।
2) शिवाजी महाराज का जन्म और प्रारंभिक जीवन
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जन्म: 19 फरवरी 1630, शिवनेरी दुर्ग (पुणे)।
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पिता: शाहजी भोंसले – बीजापुर के सरदार।
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माता: जीजाबाई – धर्मपरायण और वीरता की प्रेरणा देने वाली।
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बचपन से ही जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और मराठा वीरों की कथाएँ सुनाकर धर्म, साहस और न्याय की भावना दी।
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गुरु: दादोजी कोंडदेव ने उन्हें प्रशासन और युद्ध-कौशल में प्रशिक्षित किया।
3) शिवाजी का संघर्ष और साम्राज्य निर्माण
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शिवाजी ने किशोरावस्था से ही बीजापुर और मुगलों के किलों पर कब्ज़ा करना शुरू किया।
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1645: तोरणा किले पर विजय – यह उनकी पहली बड़ी सफलता थी।
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1647–1656: कई किले जीते – राजगढ़, पुरंदर, सिंहगढ़, प्रतापगढ़ आदि।
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1659: अफ़ज़ल खान का वध – कूटनीति और वीरता का अद्भुत उदाहरण।
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1663: शाहिस्ता खान को पुणे से खदेड़ना – साहसिक छापामार हमला।
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1664: सूरत पर हमला – मुगल व्यापारिक केंद्र को आर्थिक चोट।
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1665: पुरंदर संधि – मुगलों के साथ समझौता।
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1666: आगरा में औरंगज़ेब के दरबार से साहसिक पलायन।
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1674: रायगढ़ में छत्रपति के रूप में अभिषेक – मराठा साम्राज्य का औपचारिक जन्म।
4) गुरिल्ला युद्ध नीति (शिवसूत्र)
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शिवाजी की सबसे बड़ी सैन्य रणनीति गनिमी कावा (गुरिल्ला युद्ध) थी।
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इसमें वे
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तेज़ी से हमला करते,
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दुश्मन को थकाते,
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भूगोल और पहाड़ी-किलों का लाभ उठाते,
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दुश्मन के रसद मार्ग काटते और
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अचानक पीछे हट जाते।
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इस नीति से उन्होंने बड़ी से बड़ी सेना को मात दी।
5) प्रशासन और शासन-व्यवस्था
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अष्टप्रधान मंडल – आठ मंत्रियों की परिषद जो विभिन्न विभागों की देखरेख करती थी।
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पेशवा (प्रधानमंत्री), अमात्य (वित्त मंत्री), सच्चिव (लेखा), सुमंत (विदेश), सेनापति (सेना प्रमुख), न्यायाधीश, पंडितराव (धर्म), मानत्र्य (गृह)
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राजस्व नीति – भूमि मापन पर आधारित, किसानों पर न्यूनतम कर, सिंचाई और कृषि को बढ़ावा।
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किले और नौसेना – पश्चिमी तट पर सिंधुदुर्ग और विजादुर्ग जैसे किले; कोकण क्षेत्र की रक्षा के लिए नौसेना का विकास।
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धार्मिक सहिष्णुता – सभी धर्मों के लोगों को संरक्षण और सम्मान।
6) मराठा साम्राज्य का विस्तार और प्रभाव
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शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति संगठित हुई और मुगलों की शक्ति को चुनौती दी।
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उनके बाद संभाजी महाराज, राजाराम, तराबाई, शाहू महाराज आदि ने साम्राज्य को बनाए रखा।
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18वीं सदी में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठा साम्राज्य दिल्ली तक फैल गया।
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औरंगज़ेब के लंबे दक्कन युद्ध का प्रमुख कारण शिवाजी का स्वराज्य आंदोलन था, जिसने मुगल साम्राज्य को कमजोर कर दिया।
7) शिवाजी की विरासत और महत्व
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शिवाजी केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी राष्ट्रनायक थे।
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उन्होंने लोक-शासन की अवधारणा दी, जिसमें जनता के हित को सर्वोपरि रखा गया।
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उनकी युद्ध-नीति आज भी भारतीय सेना और विश्व के सैन्य अकादमियों में पढ़ाई जाती है।
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शिवाजी ने भारत में स्वतंत्रता और स्वाभिमान की चिंगारी जगाई, जो आगे चलकर 19वीं और 20वीं सदी के स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणा बनी।
8) निष्कर्ष
छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन साहस, नीति, संगठन और राष्ट्र-प्रेम का अद्वितीय उदाहरण है। मराठा साम्राज्य ने न केवल मुगलों की सत्ता को चुनौती दी, बल्कि भारत के लोगों में स्वराज और स्वतंत्रता की भावना भी जाग्रत की।
🇬🇧 ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और औपनिवेशिक शासन
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1757 के प्लासी युद्ध में अंग्रेजों ने बंगाल पर अधिकार जमाया।
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धीरे-धीरे उन्होंने पूरे भारत को अपने अधीन कर लिया।
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1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मंगल पांडे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब, बेगम हज़रत महल जैसे वीरों ने अंग्रेज़ों को चुनौती दी।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और औपनिवेशिक शासन
1. ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन
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1600 ई. में इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने अंग्रेज व्यापारियों को “ईस्ट इंडिया कंपनी” स्थापित करने की अनुमति दी।
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1608 ई. में यह कंपनी सबसे पहले सूरत में उतरी।
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1612 में जहांगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की इजाजत दी।
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धीरे-धीरे अंग्रेजों ने कई कारखाने (फैक्ट्रियाँ/व्यापारिक केंद्र) स्थापित किए – सूरत, मद्रास (1640), बंबई (1668), कलकत्ता (1690)।
शुरुआत में कंपनी का उद्देश्य केवल व्यापार था – मसाले, रेशम, कपड़ा और नील। परंतु आगे चलकर यह धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति बन गई।
2. बंगाल पर अधिकार और प्लासी का युद्ध (1757 ई.)
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बंगाल उस समय भारत का सबसे सम्पन्न प्रदेश था।
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नवाब सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति को चुनौती दी।
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अंग्रेजों ने विश्वासघात और षड्यंत्र का सहारा लिया।
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1757 में प्लासी का युद्ध हुआ। इसमें नवाब के सेनापति मीर जाफर ने अंग्रेजों से मिलकर गद्दारी की।
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अंग्रेजों ने विजय प्राप्त की और बंगाल पर अधिकार कर लिया।
👉 यहीं से अंग्रेजों का राजनीतिक वर्चस्व भारत में शुरू हुआ।
3. बक्सर का युद्ध (1764 ई.)
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प्लासी के बाद भी अंग्रेजों को अपनी स्थिति मजबूत करनी थी।
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1764 में बक्सर का युद्ध अंग्रेजों और तीन भारतीय शक्तियों – बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय – के बीच हुआ।
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अंग्रेजों ने निर्णायक विजय प्राप्त की।
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1765 में इलाहाबाद संधि के तहत अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूली का अधिकार) मिला।
👉 यह भारत में अंग्रेजी शासन की वास्तविक नींव थी।
4. अंग्रेजों का पूरे भारत पर विस्तार
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बंगाल में पैर जमाने के बाद अंग्रेजों ने धीरे-धीरे पूरे भारत पर अधिकार जमाना शुरू किया।
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उन्होंने सब्सिडियरी एलायंस (लॉर्ड वेलेजली की नीति) और डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (लॉर्ड डलहौजी की नीति) जैसे तरीकों से भारतीय राज्यों को अपने अधीन कर लिया।
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मैसूर के टीपू सुल्तान, पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह, मराठा संघ और सिखों की वीरता भी अंग्रेजों की चालाकी और संगठित शक्ति के सामने टिक न सकी।
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19वीं सदी के मध्य तक लगभग पूरा भारत अंग्रेजों के अधीन हो गया।
5. औपनिवेशिक शासन की नीतियाँ
अंग्रेजों का शासन भारतीयों के लिए शोषणकारी था। उनकी नीतियाँ इस प्रकार थीं –
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आर्थिक शोषण –
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भारत से कच्चा माल इंग्लैंड ले जाया जाता और वहाँ तैयार माल महँगे दामों पर भारत में बेचा जाता।
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इससे भारतीय उद्योग-धंधे नष्ट हो गए।
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किसानों पर भारी कर लगाया गया जिससे गरीबी और अकाल फैला।
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सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव –
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अंग्रेजों ने पश्चिमी शिक्षा प्रणाली लागू की।
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रेल, डाक, तार और मुद्रण यंत्र शुरू हुए।
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इससे आधुनिक चेतना आई, परंतु इसका उद्देश्य भी शासन को सुदृढ़ बनाना था।
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राजनीतिक नियंत्रण –
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भारतीय शासकों को पराजित कर या षड्यंत्र से हटाकर अंग्रेज सत्ता पर काबिज होते रहे।
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भारतीय सैनिकों और जनता को हमेशा दूसरा दर्जा दिया जाता।
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6. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
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अंग्रेजों के अत्याचार और शोषण से असंतोष पूरे भारत में फैल चुका था।
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1857 में सैनिकों के बीच विद्रोह की चिंगारी भड़की।
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इस विद्रोह का पहला नायक था मंगल पांडे, जिसने बैरकपुर छावनी में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
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इसके बाद विद्रोह फैल गया और कई भारतीय नायक इसमें शामिल हुए:
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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई – वीरता से अंग्रेजों का सामना किया और शहीद हुईं।
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नाना साहेब – कानपुर में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया।
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बेगम हज़रत महल – लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किया।
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कुंवर सिंह – बिहार में अंग्रेजों के खिलाफ लड़े।
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हालाँकि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया, लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी।
7. 1857 के बाद का औपनिवेशिक शासन
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1858 में अंग्रेजी संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया और भारत सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन आ गया।
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इसके बाद भारत पर शासन ब्रिटिश वायसराय के माध्यम से होने लगा।
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भारतीयों में धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना जागी।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।
8. निष्कर्ष
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन एक व्यापारी संस्था के रूप में हुआ, लेकिन यह धीरे-धीरे शासक शक्ति बन गई।
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1757 की प्लासी और 1764 की बक्सर की विजय ने भारत में अंग्रेजी शासन की नींव रखी।
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अंग्रेजों की औपनिवेशिक नीतियों से भारत आर्थिक रूप से निर्धन और सामाजिक रूप से कमजोर हुआ।
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1857 का संग्राम भले ही असफल रहा, लेकिन इसने स्वतंत्रता की लौ प्रज्वलित की, जो आगे चलकर 1947 में आज़ादी का स्वरूप बनी।
✊ स्वतंत्रता संग्राम – त्याग और बलिदान
1857 से 1947 तक भारत ने अनेक आंदोलनों और संघर्षों से स्वतंत्रता प्राप्त की।
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महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा का मार्ग अपनाया।
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भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव, राजगुरु ने क्रांतिकारी आंदोलन चलाया।
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सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किया।
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लाखों बलिदानों के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
🇮🇳 स्वतंत्रता संग्राम – त्याग और बलिदान (1857 से 1947 तक विस्तृत वर्णन)
भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की उन अद्वितीय गाथाओं में से एक है जिसमें लगभग दो शताब्दियों की गुलामी, असंख्य क्रांतिकारी प्रयास, अनगिनत बलिदान और अंततः आजादी की विजय शामिल है। यह सिर्फ राजनीतिक संघर्ष नहीं था बल्कि आत्मसम्मान, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक न्याय के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। आइए इसे विस्तारपूर्वक समझते हैं।
🔥 1. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम – “गदर” या “सिपाही विद्रोह”
भारत का पहला बड़ा संगठित विद्रोह 1857 में हुआ। इसे अंग्रेज इतिहासकारों ने Sepoy Mutiny कहा जबकि भारतीय इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं।
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कारण:
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अंग्रेजों की आर्थिक लूट (किसानों और बुनकरों का शोषण)
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धार्मिक भावनाओं का अपमान (कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी की अफवाह)
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सैनिकों के साथ भेदभावपूर्ण नीति
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नवाबों और राजाओं की सत्ता छीनने की नीति (Doctrine of Lapse)
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प्रमुख नेता:
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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई – वीरता की प्रतिमूर्ति
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नाना साहब – कानपुर विद्रोह के नेता
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बेगम हज़रत महल – लखनऊ की संघर्ष नायिका
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तांत्या टोपे – गुरिल्ला युद्ध के माहिर
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बख्त ख़ां – दिल्ली विद्रोह के कमांडर
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परिणाम:
विद्रोह असफल रहा लेकिन इसने अंग्रेजों को हिला दिया। भारत के लोगों में स्वतंत्रता की पहली सामूहिक चेतना जागी।
✊ 2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और प्रारंभिक आंदोलन (1885–1905)
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1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना हुई।
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शुरुआत में यह एक संवैधानिक संगठन था, जो याचिकाओं और प्रार्थनापत्रों के माध्यम से अंग्रेजों से अधिकार माँगता था।
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गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नेताओं ने नरमपंथी राजनीति अपनाई।
👉 इस दौर ने जनता को राजनीतिक जागरूकता दी।
⚡ 3. बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन (1905–1911)
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1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया। इसका उद्देश्य हिंदू–मुस्लिम एकता को तोड़ना था।
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इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ – विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई, स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा दिया गया।
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बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल (लाल–बाल–पाल त्रयी) ने आंदोलन को गति दी।
👉 इस दौर ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को क्रांतिकारी रूप दिया।
🗡️ 4. क्रांतिकारी आंदोलन और वीरों का बलिदान
1907 से आगे कई गुप्त संगठन बने जिन्होंने अंग्रेजी शासन को हिंसक तरीकों से चुनौती दी।
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भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु – लाहौर षड्यंत्र केस और असेंबली बम कांड
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चंद्रशेखर आज़ाद – हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) के नेता
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वीर सावरकर – “1857 का स्वतंत्रता संग्राम” नामक ग्रंथ लिखकर चेतना जगाई
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खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी – बम कांड में बलिदान
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रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान – काकोरी कांड के नायक
👉 इन क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ी को निर्भीकता और बलिदान का पाठ पढ़ाया।
🕊️ 5. गांधी युग – सत्याग्रह और अहिंसा की क्रांति (1915–1947)
महात्मा गांधी के भारत लौटने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन ने नई दिशा ली। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा को अपना अस्त्र बनाया।
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चंपारण सत्याग्रह (1917) – नील किसानों की विजय
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अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918)
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खेड़ा सत्याग्रह (1918) – किसानों को राहत मिली
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असहयोग आंदोलन (1920–22) – विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, विद्यालय–अदालतों का परित्याग
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नमक सत्याग्रह / दांडी मार्च (1930) – अंग्रेजी कानून की अवज्ञा का प्रतीक
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भारत छोड़ो आंदोलन (1942) – “करो या मरो” का नारा, जिसने स्वतंत्रता की नींव पक्की की
👉 गांधीजी ने आम जनता – किसान, मजदूर, महिलाएँ और विद्यार्थी – सबको इस आंदोलन से जोड़ा।
🌍 6. सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” का नारा दिया।
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उन्होंने जर्मनी और जापान से सहयोग प्राप्त कर आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) बनाई।
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अंडमान–निकोबार द्वीपों पर तिरंगा फहराकर अंग्रेजों को खुली चुनौती दी।
👉 बोस की फौज ने भारत में स्वतंत्रता की लौ और तेज कर दी।
🏴 7. स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई और विभाजन (1945–1947)
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों की शक्ति कमजोर पड़ गई।
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1945 में नेवल विद्रोह (Royal Indian Navy Revolt) ने अंग्रेजों को एहसास दिलाया कि अब भारत पर शासन संभव नहीं।
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अंग्रेजों ने स्वतंत्रता देने का निर्णय लिया लेकिन हिंदू–मुस्लिम राजनीति के चलते देश का विभाजन हुआ।
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15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन इसके साथ ही भारत–पाकिस्तान का विभाजन भी हुआ। लाखों लोग विस्थापित हुए और सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे।
✨ स्वतंत्रता संग्राम की विशेषताएँ
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यह सिर्फ राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन भी था।
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इसमें अहिंसा और क्रांति दोनों धाराएँ थीं।
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इसमें हर वर्ग – किसान, मजदूर, महिला, विद्यार्थी, व्यापारी – ने हिस्सा लिया।
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यह बलिदान, त्याग और संघर्ष की अद्वितीय गाथा है।
🌹 निष्कर्ष
भारत का स्वतंत्रता संग्राम 1857 से 1947 तक की लंबी यात्रा थी जिसमें लाखों लोगों ने बलिदान दिया। लक्ष्मीबाई की तलवार, भगत सिंह की हिम्मत, गांधीजी की अहिंसा और सुभाष चंद्र बोस का साहस – सबने मिलकर आज़ादी की नींव रखी।
15 अगस्त 1947 को फहराया गया तिरंगा सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह सदियों की दासता से मुक्ति और भारतीय आत्मा की पुनर्जन्म गाथा था।
🌟 आधुनिक भारत – स्वतंत्रता से समृद्धि तक
स्वतंत्रता के बाद भारत ने संविधान बनाया, जो 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ।
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डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार किया।
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भारत ने लोकतंत्र, विज्ञान, शिक्षा, कृषि और तकनीक में प्रगति की।
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आज भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है और वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान रखता है।
आधुनिक भारत – स्वतंत्रता से समृद्धि तक
1) प्रस्तावना
15 अगस्त 1947 को सदियों की गुलामी के बाद भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के साथ भारत के सामने गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी, साम्प्रदायिक विभाजन और आर्थिक पिछड़ापन जैसी चुनौतियाँ थीं। लेकिन दृढ़ संकल्प, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास की नीतियों के बल पर भारत ने धीरे-धीरे प्रगति की राह पकड़ी।
2) संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था
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स्वतंत्रता के बाद सबसे पहला कार्य संविधान निर्माण था।
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संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ और अध्यक्ष थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद।
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डॉ. भीमराव अंबेडकर संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने इसका मसौदा तैयार किया।
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संविधान 26 नवंबर 1949 को स्वीकार हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
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संविधान ने भारत को सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया।
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भारत में संघीय शासन व्यवस्था, मौलिक अधिकार, निर्देशात्मक सिद्धांत, स्वतंत्र न्यायपालिका और एक व्यक्ति–एक वोट का सिद्धांत लागू हुआ।
3) राजनीतिक विकास
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भारत ने लोकतंत्र को अपनाया – जहाँ जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है।
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हर 5 साल में सामान्य चुनाव होते हैं, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं।
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केंद्र और राज्यों में सरकारें बदलती रहती हैं, पर लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थिर बनी है।
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राजनीतिक स्थिरता ने आर्थिक और सामाजिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया।
4) आर्थिक प्रगति
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योजना आयोग (1950) का गठन – पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि, उद्योग, ऊर्जा, परिवहन में निवेश।
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हरित क्रांति (1960s) – डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के मार्गदर्शन में उच्च उपज वाले बीज, सिंचाई और उर्वरकों के प्रयोग से खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता।
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श्वेत क्रांति – दुग्ध उत्पादन में वृद्धि (ऑपरेशन फ्लड)।
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1991 में आर्थिक उदारीकरण – विदेशी निवेश, निजीकरण और वैश्विक व्यापार में वृद्धि।
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आज भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
5) विज्ञान और तकनीकी उपलब्धियाँ
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) – उपग्रह प्रक्षेपण, चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-एल1 जैसी सफलताएँ।
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परमाणु ऊर्जा – ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा और अनुसंधान में प्रयोग।
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आईटी सेक्टर – बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे शहर तकनीकी नवाचार के केंद्र बने।
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स्टार्टअप इंडिया – नई तकनीकी कंपनियों का तेज़ विकास; भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप हब।
6) शिक्षा और स्वास्थ्य
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स्वतंत्रता के समय साक्षरता दर लगभग 18% थी, आज यह 77% से अधिक है।
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IIT, IIM, AIIMS जैसे उच्च शिक्षा संस्थान विश्वस्तरीय मानक स्थापित कर रहे हैं।
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 – कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा और शोध पर जोर।
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आयुष्मान भारत योजना – गरीब और मध्यम वर्ग के लिए स्वास्थ्य बीमा।
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ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों का विस्तार।
7) सामाजिक परिवर्तन
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महिला सशक्तिकरण – शिक्षा, राजनीति, सेना, खेल और विज्ञान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी।
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आरक्षण नीति – सामाजिक न्याय और समान अवसर प्रदान करने के लिए।
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डिजिटल इंडिया – सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और सुविधा।
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स्वच्छ भारत अभियान – स्वच्छता और स्वास्थ्य में सुधार।
8) वैश्विक मंच पर भारत
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भारत G-20, BRICS, संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
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शांति-स्थापना अभियानों, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्यों में योगदान।
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रक्षा शक्ति – परमाणु-संपन्न, आधुनिक सेना, नौसेना और वायुसेना।
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अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तकनीकी सहयोग में प्रमुख स्थान।
9) चुनौतियाँ और आगे का मार्ग
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गरीबी, बेरोज़गारी, प्रदूषण, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ।
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शिक्षा और स्वास्थ्य में और सुधार की आवश्यकता।
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ग्रामीण–शहरी अंतर को कम करना, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास पर जोर।
10) निष्कर्ष
आधुनिक भारत ने स्वतंत्रता के बाद शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। यह देश आज सबसे बड़ा लोकतंत्र, तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक–वैज्ञानिक महाशक्ति है। भारत की यह यात्रा यह दर्शाती है कि संकल्प, एकता और परिश्रम से कोई भी राष्ट्र प्रगति के शिखर तक पहुँच सकता है।
🔮 निष्कर्ष
भारतीय इतिहास हमें सिखाता है कि –
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यहाँ की भूमि ने सभ्यता की नींव रखी।
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विद्वानों ने ज्ञान दिया।
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राजाओं ने शौर्य दिखाया।
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संतों ने अध्यात्म सिखाया।
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और जनता ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
👉 यही कारण है कि भारत आज भी “सांस्कृतिक धरोहर, शौर्य और ज्ञान” का प्रतीक है।