समय और अंतरिक्ष की भारतीय अवधारणा Indian concept of time and space
शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।
परिचय:
भारतीय दर्शन और विज्ञान में समय (काल) और अंतरिक्ष (दिक) को केवल भौतिक घटक नहीं माना गया है, बल्कि इन्हें ब्रह्मांड की गहराई से जुड़ा एक गूढ़, दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्व माना गया है। आधुनिक विज्ञान में समय और अंतरिक्ष को मापन योग्य (measurable) और स्थिर रूप में देखा जाता है, जबकि भारतीय विचारधारा में ये दोनों सजीव और चैतन्य के रूप में देखे जाते हैं — जिनका आरंभ और अंत नहीं है।
यह विषय वेदों, उपनिषदों, पुराणों, ज्योतिष, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र और योग जैसे अनेक ग्रंथों तथा परंपराओं में विस्तार से वर्णित है। आइए इसे सरल भाषा में समझते हैं।
🕉️ भाग 1: समय (काल) की भारतीय अवधारणा
1. समय का स्वरूप:
भारतीय दृष्टिकोण में समय को चक्र (चक्रवात) की तरह देखा गया है, न कि एक सीधी रेखा के रूप में। इसका अर्थ है कि समय हमेशा एक चक्र में घूमता रहता है — सृजन (उत्पत्ति), स्थिति (पालन) और संहार (विनाश) के रूप में। इसके बाद फिर से सृजन होता है — यही चक्रीय व्यवस्था है।
उदाहरण:
जैसे मौसम बदलते हैं — वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर — फिर से वसंत आता है। यह चक्रीय समय की प्रकृति है।
2. काल की इकाइयाँ (Time Units in Indian Thought):
भारतीय ग्रंथों में समय की गणना सूक्ष्म से सूक्ष्मतम और विशाल से विशालतम रूपों में की गई है।
कुछ प्रमुख इकाइयाँ:
समय इकाई | आधुनिक समय के अनुसार |
---|---|
त्रुटि | 1/34,000 सेकंड |
क्षण | 0.4 सेकंड |
निमेष | 16 त्रुटियाँ |
मuhurta | 48 मिनट |
प्रहर | 3 घंटे |
अहोरात्र (दिन-रात) | 24 घंटे |
पक्ष | 15 दिन |
मास | 30 दिन |
ऋतु | 2 महीने |
वर्ष | 12 महीने |
3. युगों की अवधारणा (Cycle of Yugas):
भारतीय समय को दीर्घकालीन दृष्टि से चार युगों में बांटा गया है:
युग | अवधि (वर्षों में) | गुणधर्म |
---|---|---|
सत्य युग | 17,28,000 वर्ष | सत्य और धर्म की प्रधानता |
त्रेता युग | 12,96,000 वर्ष | धर्म कम होता है |
द्वापर युग | 8,64,000 वर्ष | पाप और पुण्य बराबर |
कलियुग | 4,32,000 वर्ष | अधर्म का युग |
वर्तमान में हम कलियुग में हैं, जिसकी शुरुआत महाभारत युद्ध के बाद मानी जाती है (लगभग 3102 ई.पू.)।
4. ब्रह्मा का काल (Cosmic Time):
भारतीय समय दर्शन में ब्रह्मा के 1 दिन को “कल्प” कहा जाता है।
समय मापन | मानव वर्षों के अनुसार |
---|---|
1 कल्प (ब्रह्मा का दिन) | 4.32 अरब वर्ष |
1 ब्रह्मा का वर्ष | 360 कल्प = 1555 अरब वर्ष |
1 ब्रह्मा का जीवनकाल | 100 ब्रह्मा वर्ष = 1,55,500 अरब वर्ष |
उदाहरण:
आज का आधुनिक खगोलशास्त्र भी मानता है कि ब्रह्मांड की उम्र लगभग 13.8 अरब वर्ष है। यह भारत की कल्पना से मेल खाती है।
5. समय का सापेक्षता सिद्धांत (Relativity):
भारतीय ऋषियों ने यह बहुत पहले जान लिया था कि समय एक जैसा नहीं होता, यह स्थान, अवस्था, गति और चेतना के अनुसार बदलता है। यही आधुनिक विज्ञान में Einstein के सापेक्षता सिद्धांत (Theory of Relativity) की पुष्टि करता है।
उदाहरण:
भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं:
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः” (गीता 11.32)
मैं काल (समय) हूँ जो सबका नाश करता है।
यह समय की सर्वव्यापकता और अपरिवर्तनीय शक्ति को दर्शाता है।
🌌 भाग 2: अंतरिक्ष (दिक / आकाश) की भारतीय अवधारणा
1. अंतरिक्ष का अर्थ:
संस्कृत में ‘दिक्’ का अर्थ होता है “दिशा”, और ‘आकाश’ का अर्थ है “आकाश तत्व” या “स्पेस”। भारतीय दर्शन में अंतरिक्ष को ‘पंचमहाभूतों’ में से एक माना गया है — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।
आकाश सबसे सूक्ष्म तत्व है जो अन्य सभी तत्वों को स्थान देता है। इसे “सर्वव्यापी” माना गया है।
2. अंतरिक्ष का दार्शनिक पक्ष:
(क) उपनिषदों में अंतरिक्ष:
छांदोग्य और तैत्तिरीय उपनिषदों में कहा गया है कि सृष्टि का आरंभ आकाश से हुआ।
“आकाशाद्वायु, वायोरग्नि, अग्नेरापः…”
अर्थात् आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई।
यह ब्रह्मांडीय उत्पत्ति की श्रृंखला है।
3. दिक्पाल (दिशा के अधिष्ठाता देव):
भारतीय परंपरा में 10 दिशाओं को 10 देवताओं से जोड़ा गया है:
दिशा | दिक्पाल (देवता) |
---|---|
पूर्व | इन्द्र |
पश्चिम | वरुण |
उत्तर | कुबेर |
दक्षिण | यम |
ईशान (उत्तर-पूर्व) | शिव |
नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) | पितृ |
वायव्य (उत्तर-पश्चिम) | वायु |
आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) | अग्नि |
ऊर्ध्व (ऊपर) | ब्रह्मा |
अधो (नीचे) | अनंत/नाग |
यह दर्शाता है कि अंतरिक्ष भारतीय जीवन में केवल भौगोलिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक शक्ति से भी युक्त था।
4. वास्तुशास्त्र और अंतरिक्ष:
वास्तुशास्त्र, जो भवन निर्माण की भारतीय विद्या है, उसमें दिशाओं (अंतरिक्ष) का अत्यधिक महत्त्व है। घर, मंदिर, नगर आदि के निर्माण में अंतरिक्ष के नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है।
उदाहरण:
- रसोई अग्नेय कोण में होनी चाहिए।
- पूजा कक्ष ईशान कोण में होनी चाहिए।
यह दिशा और ऊर्जा (space and energy) की वैज्ञानिक समन्वय को दर्शाता है।
5. खगोलशास्त्र और ज्योतिष:
भारतीय खगोलशास्त्र (ज्योतिष) में अंतरिक्ष और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर जीवन के शुभ-अशुभ प्रभावों की गणना की जाती है। नक्षत्र मंडल, राशियाँ, ग्रहों की चाल — सब अंतरिक्ष में स्थित हैं और इन्हें दिक के आधार पर मापा जाता है।
✨ भाग 3: समय और अंतरिक्ष का आपसी संबंध
भारतीय दर्शन में काल (समय) और दिक (अंतरिक्ष) को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया। इन दोनों को एक ही ब्रह्मांडीय चेतना के दो पक्ष कहा गया है।
“कालो दिक् च ब्रह्मणः रूपं”
काल और दिक ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के शरीर हैं।
उदाहरण:
योग और ध्यान में समय (मंत्र जाप की अवधि) और अंतरिक्ष (बैठने की दिशा) का विशेष ध्यान दिया जाता है। यह ऊर्जा को केंद्रित करने में सहायक होता है।
🎯 निष्कर्ष:
भारतीय समय और अंतरिक्ष की अवधारणा केवल भौतिक नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक रूप से बहुत गहरी और समग्र है। समय को चक्र के रूप में और अंतरिक्ष को चेतन तत्व के रूप में देखा गया है। जहां आधुनिक विज्ञान अभी भी समय और अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने में लगा है, वहीं भारत के ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व इनके स्वरूप और प्रभाव को समझकर उसका विज्ञान, कला, जीवन और साधना में प्रयोग किया।
“भारत की यह दृष्टि यह दर्शाती है कि हमारी परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन वैज्ञानिक और आध्यात्मिक भी है।”