अश्वघोष द्वारा रचित ग्रंथ Books written by Ashwaghosh


अश्वघोष द्वारा रचित ग्रंथ Books written by Ashwaghosh

शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।


1. प्रस्तावना

अश्वघोष प्राचीन भारत के प्रसिद्ध संस्कृत कवि, नाटककार, दार्शनिक और बौद्ध साहित्यकार थे। वे लगभग पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी में जीवित थे। अश्वघोष को संस्कृत साहित्य के महाकाव्य युग का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं, महात्मा बुद्ध के जीवन और करुणा, त्याग तथा नैतिकता के आदर्शों को अपनी रचनाओं में अत्यंत सुंदर काव्य शैली में प्रस्तुत किया।

अश्वघोष का नाम संस्कृत साहित्य में विशेष रूप से बुद्धचरित और सौंदरनंद जैसे महाकाव्यों के कारण अमर हो गया। उनकी रचनाओं में बौद्ध धर्म के गूढ़ विचारों के साथ-साथ काव्य की रसपूर्ण अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उन्होंने न केवल महाकाव्य रचे, बल्कि बौद्ध ग्रंथों का प्रचार-प्रसार करने हेतु नाटक, गद्य और गीतों की रचना भी की।


2. अश्वघोष का जीवन और पृष्ठभूमि

अश्वघोष का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। प्रारंभ में वे वैदिक आचार्य और हिन्दू धर्म के विद्वान थे। किंतु बाद में वे बौद्ध भिक्षु बन गए और महायान बौद्ध धर्म को अपनाया। कहा जाता है कि बौद्ध भिक्षु पार्श्व से उनकी गहन चर्चा हुई, जिसके बाद वे बौद्ध धर्म की ओर मुड़े।

उनका जीवनकाल कनिष्क (कुषाण सम्राट) के काल में माना जाता है। कनिष्क ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और अश्वघोष उसके दरबार में प्रमुख कवि और दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।


3. अश्वघोष की साहित्यिक विशेषताएँ

अश्वघोष की रचनाएँ शुद्ध संस्कृत में हैं और उनमें निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं:

  • सुसंगठित कथानक: उनकी रचनाओं में कहानी, उपदेश और जीवन मूल्यों का सुंदर मेल होता है।
  • भावपूर्ण भाषा: संस्कृत के अलंकार, छंद और रस का उत्कृष्ट प्रयोग।
  • बौद्ध आदर्शों का प्रचार: उनकी रचनाएँ बौद्ध धर्म के नैतिक आदर्शों और बुद्ध के जीवन चरित्र पर आधारित हैं।
  • काव्य और दर्शन का समन्वय: उन्होंने धार्मिक भावनाओं को कवित्वपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया।

4. अश्वघोष द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ

अश्वघोष के कई ग्रंथों का उल्लेख विभिन्न बौद्ध ग्रंथों और चीनी-तिब्बती अनुवादों में मिलता है। उनके प्रमुख ग्रंथ इस प्रकार हैं:


(क) बुद्धचरित (Buddhacharita)

परिचय:

  • ‘बुद्धचरित’ अश्वघोष का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण महाकाव्य है।
  • यह महात्मा बुद्ध के जीवन चरित्र पर आधारित है।
  • इस काव्य में बुद्ध के जन्म से लेकर बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त करने तक की कथा सुंदर ढंग से वर्णित है।

रचना शैली:

  • इसमें काव्य और दर्शन का अद्भुत संगम है।
  • कुल 28 सर्ग माने जाते हैं, परंतु आज केवल 14 सर्ग पूर्णतया उपलब्ध हैं।
  • शेष सर्गों की जानकारी चीनी और तिब्बती अनुवादों से मिलती है।

महत्त्व:

  • ‘बुद्धचरित’ को संस्कृत साहित्य का प्रथम बौद्ध महाकाव्य माना जाता है।
  • यह बौद्ध धर्म का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज है।
  • बुद्ध के जीवन की घटनाओं को काव्यात्मक सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत किया गया है।

(ख) सौंदरनंद (Saundarananda)

परिचय:

  • ‘सौंदरनंद’ अश्वघोष का दूसरा महाकाव्य है।
  • यह नंद नामक व्यक्ति और उसकी पत्नी सुंदरिका की कथा पर आधारित है।

विषय-वस्तु:

  • इसमें नंद के जीवन, भोग विलास, बौद्ध धर्म की शिक्षा, और बुद्ध की प्रेरणा से उसके वैराग्य ग्रहण करने की कथा है।
  • इसमें दिखाया गया है कि किस प्रकार मोह और भोग से दूर होकर ज्ञान और मोक्ष की ओर बढ़ा जा सकता है।

विशेषताएँ:

  • इसमें श्रृंगार रस और वैराग्य रस का सुंदर संयोजन है।
  • नंद और सुंदरिका के प्रेम प्रसंगों का अत्यंत कोमल चित्रण है।
  • इस काव्य के माध्यम से बौद्ध धर्म के अष्टांगिक मार्ग और चार आर्य सत्य का उपदेश दिया गया है।

(ग) बोधिसत्वचरित (Bodhisattvacharita)

  • यह ग्रंथ बुद्ध के पूर्व जन्मों (जातक कथाओं) पर आधारित है।
  • इसमें बोधिसत्त्व (बुद्ध के पूर्वजन्म के रूप) के त्याग, करुणा और दानशीलता का वर्णन है।
  • यह काव्यात्मक रूप में रचा गया है।

(घ) सौत्रालंकार (Sutralankara)

  • ‘सौत्रालंकार’ एक दार्शनिक ग्रंथ है जिसमें बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और सिद्धांतों को काव्य-अलंकारों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
  • यह ग्रंथ महायान बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है।
  • इसमें बौद्ध धर्म को काव्यशास्त्र के दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया गया है।

(ङ) महालंकार (Maha-alankara)

  • इस ग्रंथ का उल्लेख चीनी ग्रंथों में मिलता है।
  • इसमें भी बौद्ध धर्म की दार्शनिक विवेचना और अलंकार शास्त्र की चर्चा है।

(च) सरिपुत्रप्रकरण (Sariputra-prakarana)

  • यह अश्वघोष द्वारा रचित एक नाटक माना जाता है।
  • इसमें बुद्ध के प्रधान शिष्य शारिपुत्र के जीवन और उपदेशों का नाटकीय रूप में चित्रण है।
  • यह नाटक संस्कृत साहित्य के प्राचीन नाटकों में गिना जाता है।

(छ) वैदेहिका

  • कुछ विद्वान ‘वैदेहिका’ नामक नाटक को भी अश्वघोष की रचना मानते हैं।
  • इसमें संभवतः बुद्ध के समय की किसी कथा का नाटकीय रूपांतरण था।

(ज) प्रबोधचंद्रोदय

  • हालांकि यह ग्रंथ अधिकतर विद्यानाथ के नाम से प्रसिद्ध है, पर कुछ स्थानों पर इसे अश्वघोष से भी जोड़ा गया है।
  • इसमें बौद्ध और जैन सिद्धांतों का दार्शनिक संवाद मिलता है।

5. अश्वघोष की रचनाओं का महत्व

अश्वघोष की रचनाएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महान हैं, बल्कि बौद्ध धर्म के इतिहास, संस्कृति और दार्शनिक मूल्यों को भी उजागर करती हैं।

  • धार्मिक महत्व: बुद्ध के जीवन और उनके आदर्शों का विस्तार।
  • सांस्कृतिक महत्व: उस काल की समाज व्यवस्था, रीति-रिवाज और मान्यताओं का सुंदर चित्रण।
  • साहित्यिक महत्व: संस्कृत महाकाव्य परंपरा की नींव रखने का श्रेय।
  • दर्शन का समावेश: उनकी रचनाएँ केवल कविता नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक विचारों की प्रस्तुति हैं।

6. अश्वघोष की काव्य-शैली की विशेषताएँ

  1. उत्तम छंद-व्यवस्था: बुद्धचरित और सौंदरनंद में विविध छंदों का प्रयोग।
  2. प्रकृति-चित्रण: नदियों, वनों, ऋतुओं, पर्वतों का सूक्ष्म चित्रण।
  3. रस-संयोजन: श्रृंगार, करुण, शांति और वैराग्य रस की प्रमुखता।
  4. संस्कृत का शुद्ध प्रयोग: शास्त्रीय संस्कृत के प्रयोग से उनका साहित्य आज भी आदर्श माना जाता है।
  5. नैतिक शिक्षा: उनकी रचनाओं में नैतिक और आध्यात्मिक उपदेश काव्य रूप में सहजता से समाहित हैं।

7. अश्वघोष का साहित्यिक प्रभाव

अश्वघोष के बाद के बौद्ध कवियों जैसे आर्यशूर, कालिदास, भवभूति आदि पर उनके साहित्यिक कौशल का प्रभाव देखा जा सकता है।

  • कालिदास के महाकाव्यों में जो भाव-पद्धति, रस और प्रकृति-चित्रण है, उसमें अश्वघोष की शैली का आरंभिक स्वरूप झलकता है।
  • बौद्ध धर्म के चीन, जापान और तिब्बत में प्रचार के पीछे उनके ग्रंथों का अनुवाद भी महत्त्वपूर्ण रहा।

8. अश्वघोष की रचनाओं का वर्तमान महत्व

आज भी अश्वघोष की रचनाएँ इतिहासकारों, साहित्यकारों और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ज्ञान का भंडार हैं।

  • इतिहासकारों को बुद्धचरित से बुद्ध के जीवन और उस समय की समाज व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
  • साहित्यकारों को उनकी काव्य शैली से प्रेरणा मिलती है।
  • धार्मिक दृष्टि से यह रचनाएँ बौद्ध उपदेशों का मूल स्रोत हैं।

9. निष्कर्ष

अश्वघोष ने अपने साहित्य के माध्यम से बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को कला और काव्य की सुंदर अभिव्यक्ति दी। उनका बुद्धचरित और सौंदरनंद न केवल संस्कृत महाकाव्यों की अमूल्य निधि हैं, बल्कि बौद्ध संस्कृति के रत्न भी हैं।

वे संस्कृत साहित्य के प्रथम महान कवि कहे जा सकते हैं जिन्होंने धार्मिक विचारों को काव्यात्मक सौंदर्य के साथ जोड़ा। उनकी रचनाएँ आज भी हमें जीवन के त्याग, करुणा, नैतिकता और सत्य के मार्ग की ओर प्रेरित करती हैं।


अश्वघोष के प्रमुख ग्रंथों की सूची (संक्षेप में):

  1. बुद्धचरित – महात्मा बुद्ध का जीवन चरित्र (महाकाव्य)।
  2. सौंदरनंद – नंद और सुंदरिका की कथा।
  3. बोधिसत्वचरित – बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ।
  4. सौत्रालंकार – बौद्ध धर्म की शिक्षाओं पर आधारित ग्रंथ।
  5. सरिपुत्रप्रकरण – नाटक।
  6. वैदेहिका – नाटक (कुछ विद्वान अश्वघोष को इसका लेखक मानते हैं)।
  7. महालंकार – काव्य और दर्शन पर आधारित ग्रंथ।

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