भारतीय का विश्व संचार Indian World Communication

भारतीय का विश्व संचार Indian World Communication

शुरुआत से अंत तक जरूर पढ़े। Indian World Communication

भारतीय संस्कृति का विश्व संचार विभिन्न माध्यमों और ऐतिहासिक परिवर्तनों के माध्यम से हुआ है, जिसने भारतीय विचारधारा, कला, धर्म, और सामाजिक मूल्यों को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया। इसके प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं-

1.धर्म और दर्शन
बौद्ध धर्म, जैन धर्म, और हिंदू धर्म ने कई देशों में, विशेषकर एशिया में, गहरा प्रभाव डाला। बौद्ध धर्म का प्रसार सिल्क रूट के माध्यम से हुआ, जिससे यह चीन, जापान, कोरिया और दक्षिण पूर्व एशिया तक फैला।

2.व्यापारिक संबंध
प्राचीन व्यापारिक मार्गों, जैसे कि सिल्क रूट, ने भारतीय वस्त्र, मसाले, और अन्य सामग्री को विश्वभर में पहुँचाया। इसने सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी बढ़ावा दिया।

3.कला और वास्तुकला
भारतीय वास्तुकला, विशेषकर बौद्ध स्तूप और मंदिरों ने विश्वभर में प्रशंसा प्राप्त की। भारतीय चित्रकला और शिल्पकला ने अन्य संस्कृतियों पर भी प्रभाव डाला।

4.साहित्य और ग्रंथ
वेद, उपनिषद, महाभारत, और रामायण जैसे ग्रंथों का अनुवाद और अध्ययन विश्वभर के विद्वानों द्वारा किया गया, जिससे भारतीय विचारधारा का प्रसार हुआ।

5.योग और आयुर्वेद
योग और आयुर्वेद ने स्वास्थ्य और जीवनशैली के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता प्राप्त की, जिससे भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पहलू विश्व में पहुँचा।

6.संस्कृतिक आदान-प्रदान
भारतीय संस्कृति के तत्व, जैसे कि नृत्य, संगीत, और पर्व, अन्य संस्कृतियों के साथ मिश्रित हुए, जिससे वैश्विक सांस्कृतिक विविधता में वृद्धि हुई।

इन पहलुओं ने भारतीय संस्कृति को न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान और महत्व प्रदान किया।

फुल पाठ-

साहित्य

धर्म की भाँति साहित्य के क्षेत्र में भी भारत का इस प्रदेश में असाधारण और गहरा प्रभाव पड़ा। इस प्रदेश की सभी जातियों ने ब्राह्मी वर्णमाला और संस्कृत भाषा को ग्रहण किया, उसका गम्भीर अनुशीलन कर, उसमें आश्चर्यजनक प्रवीणता प्राप्त की। इसका परिचय प्राचीन अभिलेखों से मिलता है।

मलाया, जावा, बोर्नियो से तो बहुत कम लेख मिले है, किन्तु चम्पा से 70 तथा कम्बुज से 300 के लगभग लेख पाये गये हैं। ये निर्दोष, लिलित, प्रौढ़ तथा प्रांजल भाषा में संस्कृत काव्यों की शैली का अनुसरण करते हुए, शार्दूलविक्रीडित, उपेन्द्रवज्रा, अनुष्टप, आर्या आदि प्रसिद्ध छन्दों में लिखे हुए हैं। इन्हें पढ़ते हुए हमें कालिदास और हरिषण का स्मरण होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी रचना भारत में ही हुई है। यह सच भी है, क्योंकि उस समय भारत की सीमा चीन सागर तक थी।

कई दृष्टियों से बृहत्तर भारत के अभिलेख शिलालेखों से बढ़े-चढ़े है। यशोवर्मा के चार अभिलेखों में श्लोंकों की संख्या क्रमशः 50, 75, 63, और 108 है। राजेन्द्र वर्मा के एक अभिलेख में 218 तथा दूसरे में 268 श्लोक हैं। उन्हें छोटा-मोटा काव्य कहा जा सकता है। भारत में इतने लम्बे लेख अब तक नहीं मिले। इनसे यह ज्ञात होता है कि इनके लेखकों का संस्कृत भाषा, व्याकरण, पुराणों, काव्यों का प्रगाढ़ परिचय था और भारत के दार्शनिक, धार्मिक तथा आध्यमिक विचारों का पूरा ज्ञान था। इन लेखों में वेद, वेदांगों में प्रवीण ब्राह्मणों तथा धर्मशास्त्रों का गहरा ज्ञान रखने वाले मन्त्रियों और राजाओं का वर्णन है।

मन्दिरों में प्रतिदिन रामायण, महाभारत और पुराणों के अखण्ड पाठ तथा कथाएँ होती थीं। धार्मिक साहित्य के साथ-साथ संस्कृत के लौकिक साहित्य के अनुशीलन की ओर भी पूरा ध्यान दिया जाता था। वैशेषिक, न्याय आदि दर्शनों, अर्थ-शास्त्र, तथा कामसूत्र के लेखक वात्स्यायन, नीति के प्रति विशाल तथा महर्षि सुश्रुत के भी इनमें संकेत हैं। मनु को पहला स्मृतिकार माना जाता था। राजा बड़े विद्याव्यसनी होते थे। यशोवर्मा ने पतंजली महाभाष्य टीका लिखी थी।

धर्म

प्रारम्भ में, सुवर्णद्वीप में हिन्दू धर्म की प्रधानता थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इसका आश्वासन मुख्य रूप से हिन्दू व्यापारियों, राजकुमारों तथा ब्राह्मणों ने किया। यहाँ भक्ति प्रधान पौराणिक धर्म के शैव, वैष्णव सम्प्रदाय प्रचलित थे और ब्रह्मा की भी पूजा होती थी। कम्बुज और चम्पा में शैव मत का अधिक प्रसार था।

चीनी वर्णन, प्राचीन अभिलेख और पुरातत्वीय साक्षी इस तथ्य की भली भाँति पुष्टी करते हैं। 484 ई. में जयवर्मा के राजदूत तानसेन ने फुनान में शैव-धर्म की प्रधानता का वर्णन किया था। चम्पा के पुराने अभिलेखों में प्रायः शिवलिंगों और शैव मन्दिरों की स्थापना का वर्णन है; किन्तु यहाँ विष्णु के उपासकों की भी कमी नहीं थी। एक अभिलेख में कहा गया है कि विष्णु का भक्त एक बार मन्दिर में प्रविष्ट हो जाने पर सब पापों से मुक्त हो जाता है।

खुदाइयों से मिली मूर्तियाँ भी हिन्दू-धर्म की प्रधानता सूचित करती हैं। बोर्नियों से शिव, गणेश, नन्दी, स्कन्द, महाकाव्य, विष्णु, ब्रह्मा की प्रतिमाएँ तथा मलाया प्रायद्वीप से दुर्गा, नन्दी, गणेश की मूर्तियाँ उपलब्ध हुई है। जावा में शिव तथा विष्णु के त्रिशूल, शंख, चक्र, गदा, पद्म का भी वर्णन शिव तथा श्रय देवों की प्रतिमा लिंग तथा मानवाकृति दोनों रूपों में है। विष्णु, लक्ष्मी, गरुड़ की सैकड़ों प्रतिमायें मिली है। यम, वरूण, इन्द्र, अग्नि, कुबेर आदि कालों तथा अन्य देवी देवताओं की मूर्तियों की भी कमी नहीं है।

प्रसिद्ध पुरातत्वन काफोर्ड ने जावा के संबंध में लिखा था कि हिन्दू पुराणों का शायद ही कोई ऐसा देवता हो, जिसकी प्रतिमा जावा में न पाई जाती हो। सुवर्णद्वीप के अन्य प्रदेशों के विषय में भी यह बात काफी हद तक सच है। प्राचीनकाल में यहाँ हिन्दू धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म का कम प्रचार था। पहले हीनयान सम्प्रदाय का जोर था, शैलेन्द्रों की प्रभुता के साथ 8 वीं शताब्दी ई. से महायान प्रबल हुआ, बंगाल के वज्रयान के तान्त्रिक बौद्ध धर्म का यहाँ गहरा प्रभाव पड़ा। श्रवलोकितेश्वर मैंजुली आदि बौद्धसत्वों की पूजा प्रारम्भ हुई।

सुवर्ण-भूमि बौद्ध संस्कृति का इतना बड़ा केन्द्र बना कि दीपकर जैसे महान्। आचार्य शिक्षा ग्रहण करने के लिये वहाँ आने लगे। सुवर्णद्वीप के महायान सम्प्रदाय में वे सब विशेषताएँ विद्यमान हैं जो उत्तरी भारत के बौद्ध धर्म के अन्तिम रूप में दिखाई देती हैं। दोनों स्थानों पर हम हिन्दू देवताओं को बौद्ध देवताओं में परिवर्तित किया जाता हुआ पाते हैं, तन्त्रयान और वज्रयान का विकास तथा शनैः शनैः महायान और हिन्दू धर्म में संमिश्रित होने की प्रक्रिया देखते हैं। जावा में बुद्ध को ब्रह्म, विष्णु और महेश माना गया तथा शैव और, बौद्ध मतों में भेद बताया गया।

इस समय बालिद्वीप में ही प्राचीन हिन्दू धर्म जीवित रूप में है। बालिवासियों को हिन्दू होने का गर्व है। यहाँ के शिल्पी इन्द्र विष्णु कृष्ण, सूर्य, गरुड़, शिव तथा महाभारत के अनेक पात्रों की मूर्तियाँ बनाते हैं। दुर्गा तथा शिव की पूजा होती है। इनकी पूजा करने वाले पुजारी ब्राह्मण जाति के होते हैं। इसकी उपासना विधि बिल्कुल भारतीय है। ये पूजा में जलपात्र, माला, कुशा, घास, तिल, घृत, मधु, अत्यल, धूप, दीप और घण्टी का प्रयोग तथा मन्त्रों का पाठ करते हैं। जातकर्म, नामकरण, कर्ण बेध, विवाह, अन्त्येष्टि आदि हिन्दु संस्कारों का यहाँ प्रचार है। नदियों का जल पवित्र माना जाता है।

बालि में भी गंगा, सिन्धु, यमुना, कावेरी, नर्मदा हैं किन्तु बालि वासियों का विश्वास है कि वास्तविक नदियाँ कलिंग भारत में ही है। वर्ण-व्यवस्था, अपनी जाति में ही विवाह की परिपाटी तथा सती प्रथा की पद्धति प्रचलित है। बर्मा, स्याम, कम्बोडिया और चम्पा में इस समय हीनयान का प्रसार है।

कला

प्राचीन काल में कला धर्म की चेरी थी। मूर्ति और चित्र कला का प्रधान विषय देवी-देवता थे, और वास्तुकला का मुख्य उद्देश्य उनकी पूजा के लिये मन्दिरों का निर्माण, सुवर्णद्वीप में भारतीय धर्म के साथ इन कलाओं का वहाँ पहुँचना अनिवार्य था। किन्तु सुवर्णद्वीप वासियों के लिये यह बड़े गर्व की बात है कि उन्होंने भारत से कला का पाठ पढ़ कर ‘गुरु गुड़ और चेला चीनी’ वाली कहावत को सत्य सिद्ध किया। जिस प्रकार के बेजोड़ भव्य मन्दिरों का निर्माण यहाँ हुआ वैसे देवालय न तो भारत में पाये जाते हैं और न किसी दूसरे देश में। वे विश्व के अद्भुत पदार्थो में गिने जाते हैं।

कम्बुज की कला को दो भागों में विभक्त किया जाता है। 7 वीं शती तक की आदिम कला, 7 वीं से 12 वीं शती तक की परिपक्व कला। पहली कला गुप्त शैली से अत्यधिक प्रभावित प्रतीत होती है। दोनों कला में घनिष्ठ साम्य है और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह गुप्त काल से ही प्रादुर्भूत हुई है। ग्रासलियर ने यह कल्पना की है कि भारतीय आवासक शिल्पियों और कारीगरों को भी अपने साथ भारत से लाये थे। उन्हें देवताओं की प्रतिमाओं के तथा देवालयों के निर्माण का कार्य सौंपा गया। यह सर्व-सम्मत मत है की फुनान की कला गुप्त युग की कला थी, और यह समुचे सुवर्णद्वीप में फैली।

इसी का विकसित रूप, परिपक्व कला (क्लासिकल आट) थी। यह भारतीय और वीर कथाओं का सुन्दर सम्मिश्रण था। इसका सर्वोत्तम रूप अंगकोर वत और अंघकोटथोम के मन्दिरों में है। इनकी मूर्ति और वास्तु कला उच्च कोटि की है, आज जब कम्बोडिया वासियों से यह पूछा जाता है कि इन मन्दिरों के निर्माता कौन थे तो उत्तर मिलता है कि इन्हें मनुष्यों ने नहीं किन्तु देवताओं ने बनाया है।

कम्बुज की मूर्ति कला गुप्त युगोनकला से प्रादुर्भूत हुई थी किन्तु शनैः शनैः अभ्यास से वे शिल्पी इस कला में इतने प्रवीण हो गये कि उन्होंने पाषाणों में श्रमिट काव्यों की रचना कर डाली। इनकी बनाई मूर्तियों की एक विशेषता ख्मेर मुखमण्डल है। भारतीय साहित्य में हम विष्णु की ख्मेर मुखमुद्रा का प्रायः वर्णन पढ़ते हैं।

किन्तु यहाँ उसे कभी उत्कीर्ण नहीं किया गया। कम्बुज में प्रायः सभी देवताओं की अर्ध निमीलित ख्मेर मुखमुद्रा इतने सुन्दर और विलक्षण ढंग से खोदी जाती है कि वास्तु शास्त्रियों में और कला मर्मज्ञों में वह ‘अंगकोर के ईश हास्य’ के नाम से प्रसिद्ध हो गई है। दीवारों पर नक्काशी की कला भी खूब उन्नत हुई। इसे पथ्थर पर कसीदे की सूक्ष्म तथा सुन्दर कढ़ाई कह सकते हैं। प्रस्तर खचित उद्धत चित्रों के विषय रामायण, महाभारत और हरिवंश पुराण के दृश्य है। जावा के शिल्पियों ने रामायण के दृश्यों को बड़ी सफाई से पत्थरों पर खोदा है।

वास्तु कला का उच्चतम विकास अंकोर तथा बरबुडुर (वोरोबुडूर) के मन्दिरों में हुआ। योजना, भव्यता और विशालता की दृष्टि से ये अद्वितीय तथा अद्भुत रचनाएँ है। इनकी दो विशेषताएँ ध्यान देने योग्य है। मन्दिर कई खण्डों में धरातल को उँचा उठाते हुए बनाये जाते थे। इस से मन्दिर कई खण्डों में उपर उठाते हुए पिरामिड का रूप धारण कर लेते थे। इन में चौकोर तथा बरामदे वाली गैलरियाँ बनाई जातीं थी।

प्रसिद्ध अंग्रेज वास्तुशास्त्री श्री फर्गुसन के शब्दों में इस योजना द्वारा सूर्य की सीधी धूप को बाहर रखने किन्तु प्रकाश और हवा को भी भीतर आने देने की वह महत्वपूर्ण समस्या हल की गई थी जिसे ब्रिटिश शिल्पी भारत आदि पूर्वी देशों में 100 वर्ष तक हल करने का यत्न करते रहे; किन्तु वे इसे न तो इतने कलापूर्ण और न ही सुविधाजनक ढंग से हल कर सके। इन विशेषताओं के कारण मन्दिर प्रायः समान केन्द्रीय गैलरियों की श्रेणियाँ बन गई हैं। अन्दर वाली गैलरियाँ बाहर वाली गैलरियों से उँची उठती गई हैं।

इनके चारों कोनों पर शिखर बने हुए हैं। मन्दिर और शहर चौड़ी खाइयों से घिरे हुए हैं। इन्हें पक्के जंगलेदार पुलों से बाटा गया है। अंगकोरवत के विष्णु मंन्दिर के चारों ओर 660 की. चौड़ी खाई है। इस 36 फी. चौडाई जंगलेदार पुल है। इसे पार कर हम पहले मन्दिर के घेरे में पहुँचते है।

इसकी लम्बाई चढाई मील है। इसके अन्दर तीन चौकोर घेरे क्रमशः एक दूसरे से 11 फुट, 22 फुट, और 44 फुट उंचे है। तीनों घेरों में तीन शिखर युक्त द्वार और अद्भुत चित्रों वाली गैलरियाँ, है। भारत में केवल रामेश्वर का मन्दिर ही विशालता में इनका मुकाबला कर सकता है किन्तु अलंकरण योजना की दृष्टि से वह इससे हीन है। एक प्राचीन अभिलेख के शब्दों में “अंगकोरवत के तीन खण्ड मेरु पर्वत की तीन चोटियों की तरह खड़े है। वायु में उड़ती हुई पताकाओं के कारण यह इन्द्र भवन की शोभा धारण कर रहा है, नर्तकियों के नाच गान द्वारा अमरावती को लजा रहा है।

इस मन्दिर का निर्माण 12 वीं शती. में सूर्यवर्मा द्वितीय (113-1145) ने करवाया। इसके साथ ही अंगकोर थोम के मन्दिर को जयवर्मा सप्तम 1181-1200 ने बनवाया।

इसके बाद कम्बुज का हास होने लगा। इनका मुख्य कारण भारत से आने वाली सांस्कृतिक धारा का सूख जाना था। जब तक भारतीय आवासक कम्बुज आते रहे उस समय तक कम्बुज कला निरन्तर उन्नति करती रही, किन्तु जब इसके आदि स्त्रोत भारत में तीव्रता से आने लगी तो इसमें भी ह्रास आ गया। Indian World Communication

भारत उस बर्बरता के पंक में डूब गया। जावा को इस्लाम ने जीत लिया था किन्तु वह उसे सभ्यता का पाठ नहीं पढ़ा सका। हिन्दू प्रभाव का अन्त होते ही वहाँ की सारी कलात्मक प्रगति का अन्त हो गया। फर्गुसन ने जावा के मुस्लिम विजय के संबन्ध में लिखा है, “उस समय ऐसी घटना घटी जिसके होने की उस विचित्र घटना पूर्ण इतिहास में सब से कम संभावना थी। ऐसा लगता है मानों राजों ने अपने औजार फेंक दिये और पत्थर पर नक्काशी करने वालों के हाथों से छेनियां गिर पड़ीं।

“इसके बाद जावा में किसी ऐसे भवन के निर्माण या ऐसी मूर्ति का तराशना नहीं हुआ जो कुछ भी उल्लेख योग्य हो। नौ सौ वर्ष तक विदेशी आवासक इस द्वीप को ऐसे भवनों से अलंकृत करने के लिये निरन्तर अध्यवसाय करते रहे, जो अपने वर्ग की लगभग अद्वितीय रचनाओं में से है, किन्तु इस काल के अन्त में वैसा ही हुआ, जैसा भारत में होता था। आवासकों के अधिकार की प्रगाढ़ता कम हो गई, उनका वंश शुद्ध न रहा और शक्ति तीव्र हो चली, मानो जादु की छड़ी के स्पर्श से वे लुप्त हो जाते हैं।

अकलापूर्ण स्थानीय जातीयाँ फिर अपनी प्रभुता पा लेती हैं और संभवतः सदा के लिये देश से कला का लोप हो जाता है। जो बात कला के संबन्धी में कही गई है, वह धर्म, साहित्य आदि संस्कृति के अन्य तत्वों के विषय में भी सत्य है और यह इस तत्व को निर्विवाद रूप से घोषित करती है कि सुवर्णद्वीप को सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले भारतीय थे। जब तक उनका सम्पर्क और प्रभाव रहा वे सभ्य बने रहे और उनसे संबंध विच्छिन्न होने पर वे फिर जंगली दशा में लौट गये। Indian World Communication

चंपा

फ्रांसीसी हिन्द चीन (वीयतनाम) का दुसरा भारतीय राज्य चम्पा था। 16 वीं सदी तक इसका यही नाम था ओर यहाँ रहनेवालें चम कहलाते थें। इसके बाद उत्तर से आक्रमण करनेवाले अनामियों ने इसे जीत लिया ओर सारे भुखण्ड को अन्नाम की संज्ञा प्रदान की। आरंभिक इतिहास की अनुश्रुतियाँ रामायण की घटनाओं से गहरा सदृश्य रखती हैं। इतिहासकार इन्हे अविश्वसनीय समझते हैं वे एक संस्कृत अभिलेख मे वर्णित श्रीमार को चम्पा का प्रथम ज्ञात ऐतिहासिक राजा मानते हैं। इसका राज्य काल संभवतः दुसरी श. ई. था।

इस समय चीन की सीमा टौनकीन प्रान्त तक थी। पहली श.ई. में चमों में नई जागृति हुई। उन्होंने अपनी सीमा से आगे बढ़ना और चीनी प्रदेश पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। ये चम आर्यप्राण थे और भारतीय धर्म, भाषा ओर रीति रियाजों को पूरी तरह अपना चुके थे।

चम्पापूर में अनेक हिन्दु राज्य स्थापित हुए। इनका इतिहास विश्व के स्वाधीनता संग्रामों में विशेष पड़ौसियों से लडते रहे। हजार वर्ष तक उनका शक्तिशाली चीनियों के साथ संघर्ष चलता रहा। इसके बाद वें अनामी मंगरोल तथा कम्बुज सेनाओं से जुझते रहे। इसके बाद उन्हे दबना, गिरना, ओर पीछे हटना पड़ा। Indian World Communication

किन्तु उनमें स्वाधीनता की भावना कभी नष्ट नहीं हुई। अवसर पाते हुए विद्रोह करके स्वतंत्र हो जाते थे। भारतवर्ष में उत्तर के हिन्दु राज्यों का पतन 12 वीं सदी ई. से प्रारम्भ होता हैं, 16 वीं शताब्दी के अन्त तक अकबर समुचे उत्तर भारत को अपने अधिकार में लाता है। किन्तु चम्पा के भारतीय 1822 ई. तक स्वाधीनता के लिये लड़ते हैं यह बड़े दुःख की बात भारत के वीर सपूतों के अदभुत पराक्रम की गौरव गाथा का भारतीय वाडमय में कोई वर्णन नही मिलता। चीनी इतिहास ओर चम्पा के अभिलेख ही इस पर यत्किचित प्रकाश डालते हैं।

आठवीं शताब्दी में चम्पा पर जावा वालों ने आक्रमण किये पुराना रालवंश उनके आक्रमणों के आगे नहीं टिक सका। चम्पा में प्रथवीन्द्र वर्मा (758-773 ई) के रूप में नये नेता का जन्म हुआ। इसके आगे नये सत्यवर्मा के समय जावा वालों ने एक ओर जबरदस्त हमला किया, पवित्र शिवलिंग को उठाकर ले गए और नगर को उसी प्रकार जला दिया जेसे दैत्यों के समूह ने सुरपुर जलाया सत्यवर्मा ने शत्रुओं का पीछा किया, और उन्हे मार भगाया। इसके अनुज इन्द्रवर्मा (785 – 800 ई.) के समीप भी जावा वालों से यह संघर्ष जारी रहा। अगले राजा हरिवर्मा (800-820 ई.) ने चीन से टक्कर ली और यह दावा किया की,

उसने अपने भुजडण्ड रूपी सूर्य से चीन के अन्धकार को दग्ध किया है। शैव ओर वैष्णव मन्दिरों के निर्माण तथा उन्हें दान देने की पुरातन परिपाटी जारी रखीं। 870-672 ई. तक चम्पा पर भृगु वंश ने राज्य किया। इस वंश के राजा अपना मूल पुरूष महादेव द्वारा चम्पा भेजे हुए भृगु ऋषि को मानते थे। दसवीं शताब्दी से चम्पा पर उलटे अनामियों के आक्रमण होने लगे। अगली शतियों में चम्पा वाले अनामियों के अतिरिक्त अपने पड़ौसी कमबुज वासियों तथा मंगोलों के आक्रमणों का वीरतापूर्वक मुकाबला करते रहे। Indian World Communication

कई बार उन्होंने अनामियों के दांत खट्टे कियें; किन्तु 1500 वर्ष तक अनामियों की बढ़ती हुई लहर का उनके लिये सामना करना असंभव था। 1822 ई. में अन्तिम चम राजा के लिये जब आगामी आक्रमण असह्य हो गये तो वह कम्बुज चला गया। चम्पा, अनाम बन गया, भारतीयों ने उसे जिस बर्बर व्यवस्था से निकाला था, वह फिर उसी में डूब गया।

शैलेंद्र

आठवीं सदी से सुवर्ण द्वीप में शैलेंद्रों का उत्कर्ष हुआ। 775 ई. में मलाया से उनकी राजनैतिक प्रभुता का प्रसार होने लगा। शीघ्र ही सुमात्रा, जावा आदि समूचे हिन्द द्वीप समूह के अधीश्वर बने। इनके उत्कर्ष से सारा सुवर्ण द्वीप केवल एक शासक के अधीन हुआ और अपनी समृद्धि तथा गौरव के उच्चतम शिखर तक पहुँचा, किन्तु यहाँ महायान बौद्ध धर्म और उससे संबंध रखने वाली चीनी कला का पूर्ण विकास हुआ, पूर्ण नागरी नामक नई भारतीय वर्णामाला का प्रसार हुआ।

अरब यात्रियों ने लेंद्र साम्राज्य के विस्तार और वैभव के गीत गाये है। मसउदी के शब्दों में “यहाँ का महाराजा आसीम साम्राज्य पर शासन करता है, उसकी सेना असंख्य है। अधिकतम शीघ्रगामी पोत उसके अधीनस्थ द्वीपों की परिक्रमा दो वर्ष में भी पुरी नहीं कर सकते। इस राजा के प्रदेशों में सब प्रकार के मसाले और सुगन्धित द्रव्य उत्पन्न होते हैं। दुनियाँ के किसी दूसरे सम्राट की इस राजा जितनी सम्पत्ति नही है।” इब्नखुर्दादबेह (844-48 ई.) के वर्णनानुसार राजा की दैनिक आय 200 मन सोना थी । Indian World Communication

शैलेंद्रों नें आठवीं शती के अन्तिम चरण में चम्पा पर आक्रमण किया, कम्बुज भी जीता। भारत के साथ इनका सांस्कृतिक और राजनैतिक संबंध काफी घनिष्ट था। 782 ई. में एक बंगाली कुमार घोष शैलेंद्रों का राजगुरू था। बालपुत्र नामक शैलेंद्र राजा ने नालन्दा देवयाल के समय नवीं शती लगभग मध्य में एक बिहार का निर्माण कराया, नालन्दा की खुदाइयों से कला की कांस्य मूर्तियाँ भी दोनों देशों के सांस्कृतिक सम्पर्क की सत्ता की पुष्टी करती हैं। शैलेंद्र राजा चुडामणी वर्मा ने पहगम में विहार बनवाया था, यह बात 1005 ई. के एक लेख से ज्ञात होती है।

नवीं शती ई. दक्षिण भारत में चोलों का उत्कर्ष हुआ। समुची 11 वीं शती ई. में शैलेन्द्रों का इनके साथ सामुद्रिक संघर्ष चलता रहा। संभवतः चोल पूर्वी द्वीप समुह के उस व्यापार पर अपना अधिपत्य करना चाहते थे, जिससे शैलेंद्र राजाओं ने अतुल सम्पत्ति और अनन्त वैभव प्राप्त किया था। राजेन्द्र चोल ने अपने सामुद्रिक बेडे द्वारा अंदमान, निकोबार, दक्षिणी बर्मा, मलाया, सुमात्रा आदि शैलेंद्रों के आधीन प्रदेशों की विजय की किन्तु उसके मरते ही शैलेंद्रों की शक्ती क्षीण होती गयी, 14 वीं सदी के अन्त में इस साम्राज्य का अन्त हो गया।

जिन सम्राटों की विजय वैजयन्ती सुवर्ण द्वीप के अधिकांश टापुओं पर फहारती थी जिनके चरणों में जावा, सुमात्रा, मलाया के राजाओं के मुकुट लोटते थे, उनका राज्य मलाया के एक छोटे टुकड़े मे रह गया, 1474 ई. में इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

शैलेंद्रों के बाद सुवर्णद्वीप में 14 वीं शती में बिल्वलिक नामक हिंदु साम्राज्य प्रबल हुआ। सारा मलाया प्रायद्वीप और सुवर्णद्वीप के टापू इसका अंग बन गये। किन्तु 15 वीं शती में इस का ह्मस होने लगा। इस्लाम ने हिन्दू राज्यों की परिसीमा प्रारंभ की, 1522 ई. में जावा के राजा ने भाग कर बलि के टापु में शरण ली, ओर इस समय पुर्वी हिन्द द्वीपसमुह में यही एकमात्र ऐसा टापु है जहाँ हिन्दू धर्म आज तक जीवित रूप में विद्यमान है। Indian World Communication

जावा

हिन्द पुर्वी द्वीपसमूह (मलय द्वीपावली) का प्राचीन नाम सुवर्णद्वीप है। पुराने जमाने में इसमें जावा, सुमात्रा, बोर्नियों, बालि, के अतिरिक्त मलाया प्रायद्वीप भी सम्मिलित था। इस द्वीप पुंज के टापुओं में भारतीयों ने कई छोटे-छोटे राज्य और श्रीविजय तथा विल्वतिक के शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किये। आठवी सें 14 वीं शती तक शैलेंद्र नामक भारतीय राजवंश ने भारत महासागर की लहरों पर अपना प्रतापी शासन विस्तीर्ण किया। ऐसा प्रतीत होता है कि इन टापुओं में सबसे पहिले जावा में हिन्दू राज की स्थापना हई। जावा कि अनुश्रुतियों के अनुसार पहली शतीं ई. में भारतीय यहाँ आकर बसे।

इसके उपनिवेशों का प्रधान श्रेय गुजरातियों ओर कलिंग वासियों को हैं। 132 ई. में जावा के हिन्दू राजा के चौथी या छड़ी श. ई. के चार संस्कृत अभिलेख भी प्रभुता को सूचित करते हैं। फाहियान चीन लौटते हुए 14 ई. में जावा में पाँच मास रहा था, उसनें इस द्वीप को हिन्दू धर्म का गढ़ पाया। इसके कुछ समय बाद कश्मीर से गुणवर्मा नामक बौद्ध भिक्षु का इस द्वीप में आगमन हुआ।

और उसने जावा मे महायान निकट का प्रचार किया- जावा के पड़ोस में ही सुमात्रा का टापु है। यह जावा की अपेक्षा भारत के अधिक निकट होता हुआ भी तटवर्ती पर्वत ‘मालाओं तथा दुर्भेद्य जंगलों के कारण देर में विकसित हुआ। 675-775 ई. तक श्रीविजय के राजाओं ने अग्रसर नीति का अवलम्बन किया। पहलें सुमात्रा के विविध राज्य जीते और फिर बन्दोन की खाड़ी मलाया प्रदेश भी अपने अधीन किया। Indian World Communication

मलाया

बर्मा के दक्षिण में एशिया महाद्वीप की बढ़ी हुई नोक मलाया प्रायः कहलाती हैं। इसकी प्राकृतिक सम्पत्ति भी बर्मा की भाँति आकर्षक थी। चीनी वर्णनों के अनुसार यहाँ पहला हिन्दू राज्य दुसरी शती में स्थापित हुआ। यहाँ का एक राजकुमार पिता के अप्रसन्न होने पर भारत भाग गया। पिता के मरने पर उसे भारत से बुलाकर राजा बनाया गया। बीस वर्ष शासन करने के बाद जब वह मरा तो उसके बाद भगदतो (भगदत्त) गद्दी पर बैठा। उसने 515 ई. में आदित्य नामक राजदुत चीन भेजा।

आठवीं से 12 वीं शती में तक मलाया शैलेन्दवंश के शक्तीशाली साम्राज्य का अंग रहा। 15 वीं शती में यहाँ मलाया का राज्य प्रबल हुआ, इसका संस्थापक परमेश्वर हिन्दू था, किन्तु उसने एक मुस्लिम शासक की कन्या से विवाह किया था। अपनी पत्नी के या श्वसुर के कहने से वह मुसलमान हुआ और मलाया के हिन्दू राज्य का अन्त हो गया।

कम्बुज

कम्बुज का मूलस्थान कम्बोडिया के उत्तरपूर्व में था। यह पहले फुनान के आधीन था, श्रुतवर्मा ने इसे स्वाधीन किया। स्वतंत्र होने के बाद श्रृतवर्मा के वंशजों ने इसे शक्तिशाली बनाया। किन्तु कम्बुज के 674 ई. से 802 ई. तक के सवासौ वर्षों के इतिहास पर अभी तक अन्धकार का पर्दा पड़ा हुआ है। Indian World Communication

इसके बाद कम्बुज का स्वर्णयुग शुरू हुआ। इस काल के उल्लेखनीय राजा जयवर्मा द्वितीय (802-854 ई. तथा जयवर्मा तृतीय 854- 877 ई.) हैं। इसके बाद अंगकोर का उत्कर्ष होने लगा। इन्द्रवर्मा (877-886 ई.) का यह दावा था कि ‘चम्पा प्रायद्वीप और चीन के शासक उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।’ अगला राजा यशोवर्मा (887-608 ई.) कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। राजकवियों ने उसकी प्रशंसा बड़े अतिरंजित शब्दों में की है।

‘वह द्वितीय मनु, परशरातमेसें भी अधिक उदार, अर्जुन, भीम, जैसा वीर, सुश्रुतसा विद्वान, शिल्प, भाषा लिपि और नृत्यकला में पारगंत थी। दइन अत्यूत्तियों में विश्वास न किया जाय तो भी यह मानना पड़ेगा वह एक महान विजेता, योग्य शासक, विद्याव्यसनी और विद्वानों का संरक्षक था। इसने अगंकोर थोमनगरी की स्थापना की। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय भारतीयों की एक बड़ी संख्या उत्तरी भारत से प्रवास करके यहाँ आ बसी थी, वह कम्बुज की वर्ण माला से अपरिचित थी। Indian World Communication

लित्रजन स्थानों पर केवल इनकी बस्ती थी, वहाँ यशोवर्मा ने अपने अभिलेख केवल उत्तर भारतीय लिपि में उत्कीर्ण कराये। जहाँ इनकी काफी बस्ती थी वहाँ उत्तर भारतीय लिपि के साथ कम्बुजराज्य स्थापना करना था। ये आश्रम भारतीय तपोवनों तथा गुरुकुलों के ढंग पर थे। इनका अध्यक्ष कुलपति कहलाता था। उनका मुख्य कार्य अध्यापन तथा ज्ञान की ज्योति को सदैव प्रज्वलित रखना था। कम्बुज में ये हिन्दू संस्कृति के प्रधान गढ़ थे। बड़ी संख्या में और सारे देश में स्थापित होने के कारण ये हिन्दचीन में भारतीय सभ्यता का प्रसार करते हुए बर्बर जातियों की दशा उन्नत कर रहे थे। यशोवर्मा के उत्तरधिकारियों नें 1001 ई. तक उसका यह पुनीत जारी रखा।

11 वी शतीं से कम्बुज अभूतपुर्व उत्कर्ष हुआ। 11 वीं तथा 12 वीं शतियों में जब भारत पर महमूद गजनवी और शहाबुद्दीन गोरी के आक्रमण हो रहे थे, भारत के अनेक प्रादेशिक राज्य परस्पर संघर्ष में अपनी शक्ती क्षीण कर रहे थे उस समय कम्बुज का साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से चीन सागर तक विस्तृत हो रहा था। जब उत्तर भारत में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा पवित्र मन्दिरों का ध्वंस हो रहा था उसी समय कम्बुज में अंगकोर के जगप्रसिद्ध मन्दिर बन रहे थें। इस युग में सुयवर्मा द्वितीय (1113-1145 ई.) ने अंगकोरवत का तथा जयवर्मा सप्तम (1181-1200) नें के अंगकोर थोम का निर्माण कराया।

जयवर्मा कम्बूज साम्राज्य के दीपक की अन्तिम चमक था। सैनिकों, विजयों, धार्मिक दानों तथा हस्पतालों तथा भव्य मन्दिरों को बनवानों की सेनाओं नें पूर्व में चम्पा को रौंदा ओर पश्चिम में दक्षिणी वर्मा को जीता। इस समय का साम्प्रज्य विस्तार ‘न भुतों न भविष्यति’ था। इसके मन्दिर संबन्धी दानों का इसी एक तथ्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा द्वारा स्थापित ताप्रोहम के मन्दिर मे देवताओं की सेवा के लिये 66, 625 व्यक्ति थे।

इनका व्यय चलानें के लियें 34000 गावों को दान किया गया था। इसके राज्य में 768 मन्दिर थे किन्तु प्रजा के अध्यात्मिक ‘कल्याण के साथ भौतिक सुखों की भी पुरी चिन्ता थी। रोगों को दूर करने के लिये उसने 102 चिकित्सालय बनवाएं। लोकहित के उदात्ता आदर्श की जो भावना सम्राट अशोक में थी, वही जयवर्मा में भी प्रकट हुई। इसके बाद कम्बुज का ह्रास होने लगा। स्याम में थाइयों की शक्ती बढ़ रही थी, जिस कम्बुज ने पहले स्याम पर दलित किया था, वह अब उस से पादाक्रांत होने लगा और 16 वीं शती में अधीन हुआ।

स्याम

बर्मा के दक्षिण-पूर्व में मुस्काराहटों का देश स्याम या थाईलैण्ड हैं। मंगोलवंश से सम्बंध रखनेवाली इस देश की थइ जाति यहाँ 13 वी श. ई. में आई। इससे पहले चिरकाल तक आगें वर्णन किये जाने वाले स्याम यूनान और कम्बुज जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों का अंग रहा और उनकी शक्ति समाप्त होने पर यहाँ द्वारावती (सुखोदय) और हरिविजय के राज्य स्थापित हुए। इनका श्रृंखलाबद्ध विस्तृत इतिहास नहीं उपलब्ध होता।

स्याम के पूर्व में फ्रांसिसी हिन्दचीन या वियतनाम का प्रदेश हैं। इस प्रदेश के दो भागों में शक्तीशाली भारतीय राज्यों का उत्थान और पतन हुआ। मीकांग नदी के मुहाने पर कम्बोडिया प्रान्त है और इसके पुर्व में कोचीन चीन। इन दोनो प्रांतों में पहले युनान के हिन्दू राज्य था बाद में कम्बुज साम्राज्य का विकास हुआ। दुसरा राज्य चम्पा था। यह फ्रेंच हिन्दचीन के पूर्वी भाग के अनाम प्रांत में था। इसे समाप्त हुए अभी कुल सवा सौ वर्ष ही हुए हैं। Indian World Communication

बर्मा

भारत से पूर्व की ओर बढ़ने पर सबसे पहले बर्मा आता है। यहाँ की सोने, चाँदी, लाल अदि बहुमूल्य मणियों की खानों ने भारतीयों को आकृष्ट किया। ब्रम्हपुत्र तथा सुरमा नदियों के काठों से होकर तथा चटगांव के तट के साथ-साथ चीन प्रसिद्ध स्थल पथों तथा समुद्री मार्ग से भारतीय यहाँ पहुँच कर बस्तियाँ बसाने लगे और राज्य स्थापित करने लगे।

बर्मा अनुश्रुति के अनुसार सर्वप्रथम कपिलवस्तु के शाक्यवंशी राजकुमार अभिराज ने इरावती की उपरली दुन में संकीस्सा (संकाश्य) नगरी बसायी और आसपास के प्रदेश पर अपना राज्य स्थापित किया। ई. स. पहली सहस्त्राब्दी में श्री क्षेत्र (प्रोम), सुधर्मवती (थेतोन), हंसानती (पेगु) में तथा अराकान में से वैशाली और ताम्रपट्टन के हिन्दु राज्य स्थापित हुए। 11 वीं शताब्दी से मंगोलवंशी भ्रम्मो का उत्कर्ष हुआ, इसके बाद यद्यपि बर्मा में भारतीयों का राजनैतिक प्रभुत्व नहीं रहा, किन्तु सांस्कृतिक रूप से उन्होंने उसकी पुर्ण विजय की।

यूनान

बर्मा के उत्तर में वर्तमान समय में भी काफी दुर्गम युन्नान प्रांत आठवी ई. से गन्धार नामक हिन्दु राज्य प्रबल हुआ। इसका एक भाग विदेह राज्य कहलाता था और ‘उसकी राजधानी मिथिला थी। ये दोनों भारतीय विदेह और मिथिला सें सैकडों मील दुर थे। 1253 ई. में कुब्लैखा के आक्रमण तक उनकी सत्ता बनी रही।

वर्तमान युग में बर्मा रोड ने चीन को पिछले युद्ध में लड़ाई का माल पहुँचाया हैं, किन्तु प्राचीनकाल में इस मार्ग से भारतीय धर्मदुत बौद्ध धर्म का संदेश चीन पहुँचाते रहे और उनके प्रभाव से सारा प्रदेश भारतीय बना। बर्मा के शासन राज्यों के पूर्व में उत्तर से दक्षिण तक क्रमशः आलविराष्ट्र, मे राष्ट्र, सूवर्णग्राम उन्मार्गशील, योन राष्ट्र तथा हरिपुजय नामक हिन्दू राज्य थे। यह बड़े र्दुभाग्य की बात है कि हमें इनका विस्तृत वर्णन नही मिलता। Indian World Communication


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