मौर्यकालीन प्रशासन पर लेख Article on Mauryan administration
शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।
1. प्रस्तावना
मौर्य साम्राज्य (322 ई.पू. – 185 ई.पू.) भारतीय इतिहास का प्रथम विशाल और संगठित साम्राज्य था। इसका संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था, जिसने चाणक्य (कौटिल्य) की सहायता से नंद वंश का अंत कर मौर्य वंश की स्थापना की।
मौर्य साम्राज्य के चरमोत्कर्ष का काल सम्राट अशोक (273–232 ई.पू.) का शासनकाल था। मौर्य प्रशासन की सफलता का रहस्य कुशल संगठन, प्रभावी नौकरशाही, कर प्रणाली और शक्तिशाली जासूसी तंत्र में छिपा था।
कौटिल्य का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ और अशोक के शिलालेख मौर्य प्रशासन को समझने के प्रमुख स्रोत हैं।
2. मौर्यकालीन प्रशासन की विशेषताएँ
- सर्वशक्तिमान सम्राट:
- सम्राट मौर्य शासन का केंद्र था।
- उसे धर्मपालक, न्यायप्रिय और कल्याणकारी शासक होना आवश्यक था।
- केंद्रीकृत प्रशासन:
- साम्राज्य का पूरा नियंत्रण केंद्र में था।
- प्रशासन को विभिन्न विभागों में विभाजित किया गया।
- संगठित नौकरशाही:
- मंत्री, अमात्य, युवराज, सेना प्रमुख आदि के लिए स्पष्ट जिम्मेदारियाँ थीं।
- कुशल जासूसी तंत्र:
- चाणक्य के सुझाव अनुसार विभिन्न प्रकार के गुप्तचर तैनात रहते थे।
3. मौर्यकालीन प्रशासनिक संरचना
(क) केंद्रीय प्रशासन
1. सम्राट
- सम्राट सर्वोच्च शासक था।
- वह सैन्य, न्याय, प्रशासन और विदेश नीति का मुखिया था।
- सम्राट की आज्ञा ही कानून मानी जाती थी।
2. मंत्रिपरिषद (परिषद)
- सम्राट की सहायता के लिए मंत्रियों की एक परिषद थी।
- इसमें प्रधान मंत्री (मंत्रि), सेनापति, संधिविग्रहिक (विदेश मंत्री), पुरोहित आदि प्रमुख पदाधिकारी शामिल थे।
- कौटिल्य (चाणक्य) चंद्रगुप्त का प्रधान मंत्री था।
3. प्रमुख पदाधिकारी
- महामात्य: प्रशासन का प्रमुख अधिकारी।
- समाहर्ता: कर संग्रह का प्रमुख।
- सन्निधाता: कोषागार और भंडार का प्रभारी।
- धर्ममहामात्र: अशोक द्वारा नियुक्त नैतिक मूल्यों की रक्षा करने वाला अधिकारी।
(ख) प्रांतीय प्रशासन
- मौर्य साम्राज्य को प्रांतों (जनपदों) में बाँटा गया था।
- प्रत्येक प्रांत का मुखिया कुमार (राजकुमार) या विश्वसनीय अमात्य होता था।
- प्रमुख प्रांत:
- उत्तरापथ (तक्षशिला)।
- अवंतिरथ (उज्जैन)।
- दक्षिणापथ (सुवर्णगिरी)।
- पूर्वी प्रांत (पाटलिपुत्र से जुड़ा)।
(ग) नगर प्रशासन
- नगर प्रशासन अत्यंत संगठित था।
- मेगस्थनीज (यूनानी यात्री) ने पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का विस्तृत वर्णन किया।
- नगर को छह समितियों में बाँटा गया था:
- उद्योग और शिल्प समिति – उत्पादन की देखरेख।
- विदेशी नागरिक समिति – विदेशी व्यापारियों और आगंतुकों की व्यवस्था।
- जनगणना समिति – जनसंख्या का हिसाब।
- कर समिति – कर वसूलना।
- व्यापार समिति – बाजार और व्यापार का संचालन।
- सैन्य समिति – नगर की सुरक्षा।
(घ) ग्राम प्रशासन
- गाँव मौर्य प्रशासन की सबसे छोटी इकाई था।
- ग्रामणी (ग्राम प्रमुख) गांव का प्रमुख अधिकारी था।
- ग्राम स्तर पर कर संग्रह, भूमि मापन, जल स्रोत, सुरक्षा आदि की देखरेख होती थी।
4. न्याय व्यवस्था
- मौर्यकाल में न्याय व्यवस्था राजा और अधिकारियों के अधीन थी।
- न्याय के दो स्तर थे:
- धर्मस्थ (धार्मिक न्याय): धार्मिक और नैतिक नियमों पर आधारित।
- कांतकशोधन (अपराधिक न्याय): चोरी, हत्या, अपराधों की जांच।
- दंड व्यवस्था कठोर थी।
- गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदंड या निर्वासन।
- चाणक्य के अनुसार, कठोर दंड व्यवस्था से राज्य में अनुशासन बना रहता है।
5. राजस्व और कर प्रणाली
(क) कर के प्रकार
- भूमि कर (भाग): किसान अपनी उपज का 1/4 या 1/6 भाग राज्य को देता था।
- कृषि उपज कर: फल, फूल, लकड़ी आदि पर कर।
- शुल्क (Toll): व्यापार और परिवहन पर।
- उद्योग कर: हस्तशिल्प और कारीगरों पर कर।
- जलकृत कर: जलस्रोतों या नहरों से सिंचाई करने पर कर।
(ख) राजस्व अधिकारी
- समाहर्ता और सन्निधाता कर और कोषागार के प्रमुख अधिकारी थे।
- कोषागार को कोष्ठागार कहा जाता था।
6. सेना और सुरक्षा तंत्र
(क) सेना का संगठन
- मौर्य सेना विश्व की सबसे बड़ी संगठित सेनाओं में गिनी जाती थी।
- इसमें पैदल सेना (पदाति), घुड़सवार सेना (अश्वारोही), रथ सेना (रथी), हाथी सेना (हस्ती) और नौसेना शामिल थी।
- सेनापति सेना का प्रमुख था।
(ख) जासूसी तंत्र
- चाणक्य ने जासूसी तंत्र को विशेष महत्व दिया।
- ‘संचारक’, ‘तिक्ष्ण’, ‘गुप्तचर’ नामक जासूस गुप्त सूचनाएँ एकत्र करते थे।
7. अशोक और प्रशासनिक सुधार
- अशोक ने प्रशासन को धर्म नीति (Dhamma Policy) के आधार पर चलाया।
- उसने धर्ममहामात्र की नियुक्ति की, जो जनता में अहिंसा, सहिष्णुता और करुणा का प्रचार करता था।
- अशोक के शिलालेख बताते हैं कि उसने प्रशासन में जनहित और कल्याणकारी कार्यों को बढ़ावा दिया।
8. मौर्यकालीन प्रशासन की विशेष उपलब्धियाँ
- केन्द्रीयकृत और संगठित प्रशासन।
- सुरक्षा और गुप्तचर व्यवस्था का विकास।
- उन्नत राजस्व प्रणाली।
- व्यापार और कृषि को प्रोत्साहन।
- जनकल्याणकारी कार्यों (सड़क, अस्पताल, उद्यान) की शुरुआत।
9. प्रशासन के स्रोत
- अर्थशास्त्र (कौटिल्य): मौर्य प्रशासन का वैज्ञानिक वर्णन।
- मेगस्थनीज का ‘इंडिका’: पाटलिपुत्र और राज्य व्यवस्था का चित्रण।
- अशोक के शिलालेख: धर्मनीति और प्रशासनिक नीतियाँ।
- पुराण और बौद्ध ग्रंथ: मौर्य राजवंश और शासन के विवरण।
10. निष्कर्ष
मौर्यकालीन प्रशासन प्राचीन भारत की सबसे संगठित और सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था थी। चंद्रगुप्त और अशोक जैसे शासकों ने इसे केंद्रित, मजबूत और कल्याणकारी बनाया।
- चाणक्य का अर्थशास्त्र मौर्यकाल के प्रशासन का वैज्ञानिक मार्गदर्शक था।
- अशोक ने इसमें मानवता और धर्मनीति का समावेश किया।
- मौर्य प्रशासन ने आगे आने वाले गुप्त, मौर्य-पश्चात और अन्य राजवंशों के लिए प्रशासनिक ढांचे की मजबूत नींव रखी।